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39 साल बाद मिली बाइज़्ज़त रिहाई, पर लौटकर कुछ नहीं आया: जागेश्वर प्रसाद की जिंदगी न्याय में देरी की एक दर्दनाक मिसाल
रायपुर, 16 नवंबर 2025।
अवधिया पारा की तंग गलियों में खड़ा एक पुराना, जर्जर मकान आज भी 84 वर्षीय जागेश्वर प्रसाद अवधिया के मौन संघर्ष का गवाह है। इस मकान की दीवारें टूट गई हैं, लेकिन इन दीवारों ने एक ऐसे आदमी की कहानी को संभाल रखा है जिसने 39 साल तक खुद को बेगुनाह साबित करने की लड़ाई लड़ी—और जब आखिरकार जीत मिली, तब तक जीवन का ज्यादातर हिस्सा उनसे छूट चुका था।
जागेश्वर प्रसाद, जो कभी अविभाजित मध्यप्रदेश के स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन में क्लर्क थे, 1986 में 100 रुपये की रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ्तार किए गए थे। इसी आरोप ने उनकी नौकरी, इज्जत, परिवार और भविष्य सब कुछ छीन लिया। अब, चार दशक बाद हाईकोर्ट ने उन्हें बाइज़्ज़त बरी कर दिया है। लेकिन इस फैसले का दर्दनाक सच यही है कि बहुत देर हो चुकी है।
“नौकरी गई, सम्मान चला गया… इस फैसले का अब कोई मतलब नहीं”—अवधिया की पीड़ा
अपने घर में बैठे, कांपते हाथों से पुराने पीले पड़ चुके दस्तावेज़ों को पलटते हुए अवधिया कहते हैं—
“हाईकोर्ट ने मुझे बेगुनाह कहा है, लेकिन उस कागज़ का वजन उस बोझ के सामने कुछ भी नहीं, जो 39 साल तक पूरे परिवार ने ढोया।”
1986 की गिरफ्तारी सिर्फ अवधिया के लिए नहीं, बल्कि पूरे परिवार के लिए सजा की शुरुआत थी। समाज ने मुंह मोड़ लिया, रिश्तेदार दूर हो गए, बच्चों की पढ़ाई छूट गई, और इलाज के अभाव में उनकी पत्नी की मौत हो गई।
बेटे की आंखों में बचपन का रोना आज भी जिंदा है
उनके छोटे बेटे नीरज, जो गिरफ्तारी के समय 13 साल के थे, आज 52 वर्ष के हो चुके हैं। लेकिन दर्द आज भी वही है।
वे कहते हैं—
“लोग हमें रिश्वतखोर का बच्चा कहते थे। मोहल्ले में दरवाज़े बंद हो गए। फीस न भरने पर स्कूल से निकाल दिया जाता था। हमारा बचपन अदालत की सीढ़ियों पर खत्म हो गया।”
पत्नी की मौत ने तोड़ दिया परिवार
अवधिया बताते हैं कि पत्नी इंदू धीरे-धीरे अवसाद में डूबती चली गईं।
“इलाज के पैसे नहीं थे। 24 दिन अस्पताल में रहीं और फिर एक दिन चली गईं। अंतिम संस्कार के लिए भी मेरे पास पैसे नहीं थे। एक दोस्त ने तीन हजार रुपये दिए, तब जाकर क्रिया-कर्म हो पाया।”
निलंबन, गरीबी और संघर्ष की लंबी सजा
1988 में निलंबन के बाद छह साल नौकरी से बाहर रहने और फिर रीवा ट्रांसफर ने उनकी जिंदगी और मुश्किल कर दी। आधी तनख्वाह से चार बच्चों का खर्च चलाना असंभव था।
घर चलाने के लिए उन्हें कभी ट्रैवल एजेंसी में, तो कभी बस मालिकों के यहाँ काम करना पड़ा।
100 रुपये के आरोप ने उन्हें करीब 14,000 दिनों की मानसिक कैद में रखा।
हाईकोर्ट का फैसला—39 साल बाद न्याय, लेकिन जिंदगी पहले ही हार चुकी थी
2025 में हाईकोर्ट ने सभी आरोपों को आधारहीन बताते हुए अवधिया को बरी कर दिया।
लेकिन अब न नौकरी है, न सम्मान, न पत्नी… और न लौट सकने वाला समय।
अवधिया कहते हैं—
“न्याय मिला पर जीवन नहीं लौटा।”
न्यायपालिका की सच्चाई: हजारों मामले दशकों से लंबित
अवधिया का मामला सिर्फ एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है।
छत्तीसगढ़ में आज—
- कुल लंबित मामले: 77,616
- 5–10 साल पुराने मामले: 19,154
- 10–20 साल पुराने मामले: 4,159
- 20 साल से अधिक पुराने मामले: 105
कई मामले 40 से 50 साल से लंबित हैं।
दुर्ग का ताराबाई बनाम भगवानदास मामला 1976 से लंबित है—दोनों पक्षों की मौत हो चुकी है, पर फैसला नहीं आया।
अंबिकापुर में 1979 का मामला 291 बार तारीख़ें लेने के बाद भी आज तक खत्म नहीं हुआ।
पूर्व मुख्य न्यायाधीश यतीन्द्र सिंह कहते हैं—
“देरी से मिला न्याय, अक्सर न्याय नहीं रह जाता।”
अवधिया की अंतिम इच्छा—पेंशन और बकाया
अवधिया आज सरकार से सिर्फ इतना चाहते हैं कि उन्हें उनका बकाया और पेंशन दे दी जाए।
वे कहते हैं—
“अब कोई न्याय नहीं चाहिए। बस इतना हो कि इन हाथों को जिंदगी के आखिरी दिनों में किसी के सामने फैलाना न पड़े।”
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समाचार स्रोत ⏩बीबीसी हिंदी
