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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: घर के भीतर कहे गए जातिसूचक शब्दों पर SC/ST एक्ट का मुकदमा रद्द, IPC की कार्यवाही जारी रहेगी
09 दिसंबर 2025, नई दिल्ली।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (SC/ST Act) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में अहम फैसला सुनाते हुए आरोपियों के खिलाफ इस कानून के तहत दर्ज मुकदमे को रद्द कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता का घर सार्वजनिक स्थल नहीं माना जा सकता, और इसलिए घर के भीतर कहे गए जातिसूचक शब्द SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(S) के तहत अपराध की कानूनी शर्तें पूरी नहीं करते। हालांकि, अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि आरोपियों के खिलाफ IPC के तहत दर्ज अपराधों की कार्यवाही कानून के अनुसार आगे जारी रहेगी।
मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक आदेश से जुड़ा था, जिसे चुनौती देते हुए आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी। हाई कोर्ट ने अधीनस्थ अदालत के आदेश को बरकरार रखा था, जिसमें आरोपियों को IPC और SC/ST एक्ट के तहत मुकदमे का सामना करने के लिए तलब किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ — जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता — ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि हाई कोर्ट ने अपने आदेश में माना था कि शिकायतकर्ता के बेटे को आरोपियों ने सार्वजनिक सड़क पर सबके सामने पीटा था, जिससे घटना SC/ST एक्ट के दायरे में आती है। इसी संदर्भ में पीठ ने धारा 3(1)(S) का उल्लेख किया, जिसमें किसी सार्वजनिक स्थान या सार्वजनिक रूप से दृश्य किसी भी स्थान पर जातिसूचक शब्द कहे जाने पर दंड का प्रावधान है।
लेकिन शीर्ष अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता के पहले आवेदन से यह साफ होता है कि जातिसूचक शब्द घर के अंदर कहे गए थे। अदालत ने टिप्पणी की कि यह परिस्थिति कानून की उस अनिवार्य शर्त को पूरा नहीं करती, जिसमें ‘सरेआम और सार्वजनिक रूप से दृश्य’ स्थान पर अपमानजनक शब्द कहे जाना जरूरी है। न्यायालय ने यह भी जोड़ा कि शिकायतकर्ता का घर किसी भी स्थिति में सार्वजनिक स्थान नहीं माना जा सकता।
इस फैसले ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि SC/ST एक्ट के तहत कार्रवाई तभी संभव है जब अपराध सार्वजनिक स्थान या सार्वजनिक रूप से दृश्य परिस्थिति में हुआ हो। वहीं IPC के तहत आरोप गंभीर माने जाते हैं, और उन पर कार्यवाही पूर्व की भांति आगे बढ़ेगी।
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