
“NGV PRAKASH NEWS”
बांग्लादेशी हिंदुओं पर हमलों के मुद्दे पर मायावती की मुखरता ने बदला सियासी संतुलन, विपक्ष की चुप्पी पर उठे सवाल
लखनऊ।
बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों, खासकर दलित समुदाय पर हो रहे हमलों के मुद्दे पर बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती की मुखर प्रतिक्रिया ने उत्तर भारतीय राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। 25 दिसंबर को सोशल मीडिया पर दिए गए उनके तीखे बयान के बाद न केवल हिंदुत्व की राजनीति को नया संदर्भ मिला है बल्कि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस जैसी पार्टियों की चुप्पी भी राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गई है।
मायावती ने अपने बयान में बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों की हत्या और उत्पीड़न को गंभीर और चिंताजनक बताते हुए केंद्र सरकार से अपेक्षा जताई कि वह इस विषय पर अधिक सक्रिय और प्रभावी भूमिका निभाए। उन्होंने हाल ही में एक दलित युवक की नृशंस हत्या का उल्लेख करते हुए कहा कि इससे पूरे देश में आक्रोश स्वाभाविक है और सरकार को इस पर तत्काल संज्ञान लेना चाहिए। उन्होंने यह भी जोड़ा कि अपने देश में दलितों और आदिवासियों पर हो रहे अत्याचार भी कम चिंताजनक नहीं हैं, लेकिन पड़ोसी देश में अल्पसंख्यकों की स्थिति उससे कम गंभीर नहीं कही जा सकती।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार मायावती का यह रुख सिर्फ भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है। लोकसभा में शून्य और उत्तर प्रदेश विधानसभा में सीमित उपस्थिति के बाद बसपा अपने पारंपरिक सामाजिक आधार को दोबारा संगठित करने की कोशिश में है। बांग्लादेश में पीड़ित हिंदुओं का बड़ा हिस्सा दलित समुदाय से जुड़ा होना मायावती को इस मुद्दे पर नैतिक और राजनीतिक दोनों तरह की जमीन देता है। इससे वह खुद को न केवल दलितों की बल्कि व्यापक हिंदू समाज की आवाज के रूप में प्रस्तुत कर पा रही हैं।
इस बयान के बाद सबसे ज्यादा चर्चा विपक्षी दलों की चुप्पी को लेकर हो रही है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं दी है, जबकि वे गाजा जैसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दों या देश के भीतर सांप्रदायिक तनाव के मामलों पर मुखर रहते हैं। राजनीतिक हलकों में इसे मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। 2024 के लोकसभा चुनावों में मुस्लिम समर्थन के झुकाव को देखते हुए विपक्ष इस विषय से दूरी बनाए हुए है, क्योंकि उसे डर है कि इससे ध्रुवीकरण बढ़ सकता है और भाजपा को राजनीतिक लाभ मिल सकता है।
इसी बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा में इस मुद्दे को उठाकर विपक्ष पर तीखा हमला किया था। उन्होंने सवाल किया था कि जब बांग्लादेश में एक हिंदू की लिंचिंग होती है तो विपक्ष खामोश क्यों रहता है, जबकि अन्य अंतरराष्ट्रीय मामलों पर वह तुरंत प्रतिक्रिया देता है। योगी के इस बयान के बाद भी विपक्ष की ओर से कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं आई, जबकि मायावती ने सोशल मीडिया पर खुलकर चिंता जताई और इसे गंभीर मानवाधिकार का मुद्दा बताया।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि मायावती का यह रुख बसपा को एक बार फिर ‘असल दलित पार्टी’ के रूप में स्थापित करने की कोशिश है, जो केवल घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी दलितों और उत्पीड़ितों के पक्ष में खड़ी होती है। यह रुख पूर्वांचल जैसे क्षेत्रों में भी असर डाल सकता है, जहां बांग्लादेशी घुसपैठ और सीमा पार घटनाएं लंबे समय से राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रही हैं।
शेख हसीना सरकार के पतन के बाद बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं और भारत में इसका असर राजनीतिक विमर्श पर साफ दिखने लगा है। ऐसे में मायावती की मुखरता ने न सिर्फ हिंदुत्व की राजनीति को एक नया सामाजिक आयाम दिया है, बल्कि विपक्ष की रणनीतिक चुप्पी को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। आने वाले समय में यह मुद्दा 2026 तक की राजनीति में कितना प्रभाव डालेगा, यह देखना अहम होगा, लेकिन इतना साफ है कि मायावती के इस बयान ने सियासी बहस की दिशा बदल दी है।
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