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सपा का मास्टर कार्ड -ज्योत्स्ना सिंह
प्रतापगढ़
07 जनवरी 2026
ज्यों-ज्यों 2027 का विधानसभा चुनाव नज़दीक आ रहा है, उत्तर प्रदेश की सियासत में तापमान तेज़ी से बढ़ता जा रहा है। हर दल अपनी रणनीति को अंतिम रूप देने में जुटा है, लेकिन सबसे ज़्यादा नज़रें इस वक्त प्रतापगढ़ की कुंडा विधानसभा सीट पर टिकी हुई हैं — वही सीट जो अब तक राजा भैया का अभेद्य किला मानी जाती रही है।
अब इसी किले में सेंध लगाने के लिए समाजवादी पार्टी एक ऐसा दांव खेलने की तैयारी में है, जो पूरी सियासत का समीकरण बदल सकता है। सपा इस बार पुराने फार्मूले छोड़कर राजा भैया के सामने एक युवा, पढ़ी-लिखी और स्थानीय महिला चेहरे को उतारने की तैयारी में दिख रही है।
ज्योत्स्ना सिंह — सपा का ‘सरप्राइज़ कार्ड’?
सपा के भीतर चल रहे मंथन में जिस नाम ने सबसे ज़्यादा हलचल मचा रखी है, वह है — ज्योत्स्ना सिंह। पार्टी सूत्रों के मुताबिक 5 जनवरी को हुई एक अहम बैठक में अखिलेश यादव ने उनके नाम को लेकर सकारात्मक संकेत दिए हैं। भले ही अभी औपचारिक घोषणा न हुई हो, लेकिन संगठन के भीतर उन्हें लेकर गंभीर तैयारी शुरू हो चुकी है।
राजनीतिक जानकार इसे सपा का “सरप्राइज़ मूव” मान रहे हैं — ऐसा कदम जो राजा भैया की पारंपरिक चुनावी रणनीति को सीधे चुनौती देता है।
राजनीतिक विरासत + आधुनिक छवि = नया कॉम्बिनेशन
ज्योत्स्ना सिंह प्रतापगढ़ की ही बेटी हैं और उनका परिवार दशकों से राजनीति में सक्रिय रहा है। उनकी मां सपा से जुड़ी रहीं और प्रतापगढ़ सदर से ब्लॉक प्रमुख रह चुकी हैं, वहीं उनके पिता राजकुमार सिंह भी उसी क्षेत्र के प्रमुख रहे हैं। यानी राजनीतिक समझ उन्हें विरासत में मिली है।
दूसरी ओर, उन्होंने राजस्थान से पढ़ाई की है और उन्हें एक पढ़े-लिखे, संतुलित और आधुनिक सोच वाले चेहरे के रूप में देखा जाता है। मछलीशहर की सांसद प्रिया सरोज के साथ उनकी नज़दीकी भी उन्हें युवा वोट बैंक से जोड़ती है। यही वजह है कि अखिलेश यादव की “युवा और शिक्षित नेतृत्व” की लाइन में ज्योत्स्ना पूरी तरह फिट बैठती हैं।
गुलशन यादव की राह मुश्किल?
2022 में राजा भैया के खिलाफ मैदान में उतरे गुलशन यादव ने मुकाबला कड़ा जरूर किया था और जीत का अंतर घटा दिया था। लेकिन अब नए नाम की चर्चा यह साफ कर रही है कि सपा इस बार सिर्फ मुकाबला नहीं, बल्कि पूरा खेल पलटने की रणनीति पर काम कर रही है।
यानी सवाल अब यह नहीं कि राजा भैया जीतेंगे या नहीं, बल्कि यह बन गया है कि सपा इस बार कुंडा में कितना बड़ा राजनीतिक विस्फोट करने जा रही है।
जोखिम भी, लेकिन बड़ा दांव भी
यह भी सच है कि ज्योत्स्ना सिंह के परिवार का प्रभाव मुख्यतः प्रतापगढ़ सदर में रहा है। ऐसे में उन्हें कुंडा से उतारना सपा के लिए एक बड़ा जोखिम भी है। लेकिन राजनीति में बड़े उलटफेर अक्सर बड़े जोखिम से ही जन्म लेते हैं।
कुल मिलाकर कुंडा की लड़ाई अब सिर्फ एक सीट की नहीं रही — यह सपा की रणनीति, अखिलेश यादव की राजनीतिक दिशा और राजा भैया की पकड़ की सबसे बड़ी परीक्षा बनने जा रही है।
अगर सपा ज्योत्स्ना सिंह को मैदान में उतारती है, तो यह फैसला कुंडा की राजनीति में नई लकीर खींचने वाला कदम साबित हो सकता है।
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