पुलिस विभाग पर काला धब्बा-92 करोड़ की अवैध संपत्ति के बेताज बादशाह डीएसपी ऋषिकांत शुक्ला…….

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वरिष्ठ पुलिस अधिकारी पर भ्रष्टाचार और काले धन के गंभीर आरोप, विजिलेंस जांच शुरू

लखनऊ 20 जनवरी 26.

उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी, डीएसपी ऋषिकांत शुक्ला, पर अवैध संपत्ति, भ्रष्टाचार, काले धन और फर्जी नेटवर्क से जुड़े बड़े आरोपों के सिलसिले में जांच का दायरा बढ़ गया है। यह मामला कानपुर एवं अन्य जिलों से जुड़ी जांच रिपोर्टों के आधार पर सामने आया है, जिसने पुलिस महकमे में हलचल मचा दी है।

सूत्रों के अनुसार, डीएसपी ऋषिकांत शुक्ला, जो लंबे समय तक कानपुर और आसपास के इलाकों में तैनात रहे हैं और वर्तमान में मैनपुरी में पदस्थ थे, पर अपनी आय से कहीं अधिक संपत्ति अर्जित करने, बेऊमी (बेनामी) संपत्तियों के नेटवर्क का संचालन करने और एक संगठित भ्रष्टाचार प्रणाली में शामिल होने के आरोप हैं। जांच में यह भी संकेत मिले हैं कि उनका नाम और उनके करीबी लोगों के नाम पर बड़ी संपत्तियों का जाल बिछाया गया है।

प्रारंभिक एसआईटी (विशेष जांच दल) की जांच में पाया गया है कि शुक्ला और उनके नेटवर्क से जुड़े व्यक्तियों के पास लगभग 12 संपत्तियाँ हैं जिनकी बाजार कीमत करीब ₹92 करोड़ रुपये आंकी गई है, जिनमें आर्यनगर क्षेत्र में 11 दुकानें और अन्य जमीनें शामिल हैं। इन संपत्तियों के दस्तावेजों की पड़ताल अभी भी चल रही है, और कुछ मामलों में रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हो पाए हैं।

जांच में यह भी सामने आया है कि डीएसपी शुक्ला ने बेइरादा तरीके से बेनामी संपत्तियों और फर्जी कंपनियों के माध्यम से धन को सफेद किया। शिकायतकर्ता के आरोपों के अनुसार उनके बेटे और सहयोगियों ने 33 कंपनियाँ बनाई, जिनका इस्तेमाल कथित तौर पर काले धन को वैध व्यवसायों में बदलने के लिए किया गया।

एक अन्य पहलू यह है कि शुक्ला के खिलाफ एसआईटी जांच में बताया गया है कि उन्होंने 1998 से 2009 के बीच कानपुर में अपने तैनाती के दौरान अपनी आधिकारिक आय से कई गुणा अधिक संपत्ति अर्जित की, जिसे अब जांच के दायर में शामिल किया गया है। जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि उनकी बेनामी संपत्तियाँ केवल कानपुर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि नोएडा, पंजाब, चंडीगढ़, उन्नाव और फतेहपुर जैसे शहरों में भी उनके पास संपत्तियों के सुराग मिले हैं

घटना सामने आने के बाद शासन ने डीएसपी ऋषिकांत शुक्ला को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है और उनके खिलाफ विजिलेंस (सतर्कता) जांच के आदेश जारी किए गए हैं। विभागीय घेराबंदी बढ़ाते हुए यह फैसला लिया गया है ताकि जांच को विधिवत रूप से आगे बढ़ाया जा सके और यह सुनिश्चित किया जाए कि आरोपों की गंभीरता की निष्पक्ष रूप से पड़ताल हो।

बताया जाता है कि यह मामला उत्तर प्रदेश पुलिस के इतिहास में भ्रष्टाचार और संपत्ति के गड़बड़ी से जुड़े सबसे बड़े मामलों में से एक माना जा रहा है, और अगर जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो आगे की कानूनी कार्रवाई में प्रवर्तन निदेशालय (ED)आयकर विभाग की एंट्री भी संभव है। फिलहाल विभागीय स्तर पर विस्तृत जांच की तैयारी जारी है और केस के कई पहलुओं पर अतिरिक्त सुबूत जुटाए जा रहे हैं ताकि सच्चाई उजागर की जा सके।

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