‘नो कास्ट, नो रिलीजन’ प्रमाणपत्र पर हाई कोर्ट की सख्ती, धर्म त्याग का औपचारिक प्रमाण जरूरी….

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‘नो कास्ट, नो रिलीजन’ प्रमाणपत्र पर हाई कोर्ट की सख्ती, धर्म त्याग का औपचारिक प्रमाण जरूरी

चेन्नई/मदुरै, 24 फरवरी 2026.

‘नो कास्ट, नो रिलीजन’ (No Caste, No Religion) प्रमाणपत्र को लेकर की मदुरै बेंच ने एक अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि ऐसा प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए आवेदक को पहले औपचारिक रूप से अपना धर्म त्यागना होगा। कोर्ट के इस फैसले के बाद कानूनी और सामाजिक हलकों में बहस तेज होने की संभावना जताई जा रही है।

मामला उस याचिका से जुड़ा है जिसमें एक व्यक्ति ने अधिकारियों से ऐसा प्रमाणपत्र जारी करने की मांग की थी, जिसमें उसकी जाति और धर्म का कोई उल्लेख न हो। याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि उसके माता-पिता हिंदू धर्म से संबंधित हैं, लेकिन वह स्वयं जाति और धर्म का उल्लेख नहीं चाहता।

सुनवाई के दौरान डिवीजन बेंच ने साफ कहा कि केवल इच्छा व्यक्त करने से ‘नो कास्ट, नो रिलीजन’ प्रमाणपत्र जारी नहीं किया जा सकता। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 25 का हवाला देते हुए कहा कि विवेक की स्वतंत्रता के तहत व्यक्ति को धर्म अपनाने और त्यागने दोनों का अधिकार है। हालांकि, यदि कोई व्यक्ति धर्म त्यागने का दावा करता है, तो उसका औपचारिक और प्रमाणित रिकॉर्ड होना आवश्यक है।

कोर्ट ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता से सीधे पूछा कि क्या उसने अपना धर्म विधिवत त्याग दिया है। इस पर याचिकाकर्ता ने नकारात्मक उत्तर दिया। पीठ ने टिप्पणी की कि जब तक आवेदक हिंदू रीति-रिवाजों या विधिसम्मत प्रक्रिया के तहत अपना धर्म त्यागने का प्रमाण प्रस्तुत नहीं करता, तब तक जाति और धर्म का उल्लेख हटाकर प्रमाणपत्र जारी करने का अनुरोध विचारणीय नहीं है।

अदालत ने यह भी कहा कि धर्म त्याग से संबंधित कोई दस्तावेज या साक्ष्य रिकॉर्ड पर प्रस्तुत नहीं किया गया है। इसी आधार पर कोर्ट ने तहसीलदार के आदेश को रद्द करने से इनकार करते हुए रिट याचिका खारिज कर दी। हालांकि, याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी गई कि यदि वह विधिवत धर्म त्याग कर उसका प्रमाण प्रस्तुत करता है, तो वह नया आवेदन दे सकता है, जिस पर संबंधित अधिकारी कानून के अनुसार विचार करेंगे।

डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार को यह भी निर्देश दिया कि ऐसे मामलों में राजस्व अधिकारियों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने हेतु आवश्यक सरकारी आदेश पर विचार किया जाए, ताकि भविष्य में समान प्रकरणों में एक समान प्रक्रिया अपनाई जा सके।

इस निर्णय ने ‘नो कास्ट, नो रिलीजन’ जैसे संवेदनशील मुद्दे पर कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए यह संकेत दिया है कि व्यक्तिगत आस्था से जुड़े दावों के लिए औपचारिक और विधिक प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है।

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