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💥50 वर्षों से बसे दलित परिवार पर संकट: चकबंदी आदेश से उजड़ने की कगार पर पहुंचा पट्टाधारक परिवार, मनमानी के आरोप
बस्ती, 15 जून 2026.
बस्ती जिले के कलवारी मुस्तहकम क्षेत्र में चकबंदी विभाग के एक आदेश को लेकर भारी नाराजगी देखने को मिल रही है। आरोप है कि वर्षों से पट्टे की जमीन पर मकान बनाकर रह रहे और उसी भूमि पर खेती-बाड़ी कर परिवार का भरण-पोषण करने वाले एक दलित परिवार की आजीविका पर प्रशासनिक निर्णय के कारण गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार दलित जुग्गीलाल और रामलाल पुत्रगण विश्राम का परिवार लगभग 50 वर्षों से गाटा संख्या 33 की भूमि पर निवास कर रहा है। बताया जाता है कि यह भूमि विश्राम को सरकार की ओर से 99 सालों के लिये पट्टे पर मिली थी, जिस पर उन्होंने स्थायी आवास बनाया और खेती-बाड़ी के माध्यम से अपने परिवार का जीवनयापन करते रहे।
आरोप है कि समय के साथ कुछ लोगों की नजर इस जमीन पर पड़ गई और चकबंदी प्रक्रिया के दौरान कथित रूप से प्रभाव का इस्तेमाल कर इस भूमि पर अपना चक बैठवाने का प्रयास किया गया।
जब जुग्गीलाल और रामलाल को इस मामले की जानकारी हुई तो उन्होंने विभिन्न स्तरों पर आपत्ति दर्ज कराई और अपने अधिकारों की रक्षा के लिए लगातार अधिकारियों के चक्कर लगाए, और उनके पक्ष में निर्णय भी आया |
आरोप है कि विवादित स्थिति बनने के बाद भी मामले का निष्पक्ष समाधान नहीं निकाला गया। इसके बजाय उपचकबंदी अधिकारी की संस्तुति पर चकबंदी अधिकारी हर्रैया द्वारा गाटा संख्या 33, रकबा 0.524 हेक्टेयर को वृक्षारोपण के लिए रिजर्व करने का आदेश पारित कर दिया गया।
इस निर्णय के बाद प्रभावित परिवार के सामने गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। परिवार का दावा है कि जिस जमीन पर उनका मकान और आजीविका दोनों निर्भर हैं, उसी को वृक्षारोपण हेतु आरक्षित कर दिए जाने से उनके सामने भविष्य को लेकर असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है। लोगों का कहना है कि यदि आदेश पर अमल हुआ तो परिवार के पास जीवनयापन का कोई साधन नहीं बचेगा।
मामले को लेकर स्थानीय स्तर पर यह भी सवाल उठाए जा रहे हैं कि गांव में अन्य ग्राम सभा भूमि उपलब्ध होने के बावजूद इसी पट्टे की भूमि को वृक्षारोपण के लिए क्यों चुना गया।
वहीं आरोप है कि कुछ प्रभावशाली लोगों के दबाव और व्यक्तिगत रंजिश के चलते चकबंदी अधिकारियों एवं कर्मचारियों को दबाव में लेकर इस भूमि को वृक्षारोपण के लिये चयनित करवाया गया है।
एक तरफ सरकार लोगों को छत मुहैया करवा रही है वहीं एक दलित परिवार के आशियाने को उजाड़ने की तैयारी चकबंदी विभाग ने कर की है।
लोगों का कहना है कि यदि वास्तव में भूमि पर दशकों से परिवार निवास कर रहा है और उसका जीवनयापन उसी पर निर्भर है, तो ऐसे मामलों में मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए निर्णय लिया जाना चाहिए। ग्रामीणों ने यह भी मांग की है कि विवादित आदेश की समीक्षा कर प्रभावित परिवार को राहत प्रदान की जाए तथा पूरे प्रकरण में चकबंदी प्रक्रिया की जांच कराई जाए।
अब यह मामला स्थानीय स्तर से निकलकर प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनने लगा है। यदि आरोपों में सच्चाई पाई जाती है तो यह सवाल खड़ा होगा कि आखिर सरकारी पट्टे पर वर्षों से जीवन गुजार रहे परिवार के अधिकारों की रक्षा कौन करेगा और चकबंदी प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी है।
G. P. Dubey
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