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सपा में ‘टिकट की दावेदारी’ पड़ी भारी या अंदरूनी सियासत का खेल? बस्ती में राघवेन्द्र सिंह के निष्कासन से सियासी पारा गरम!
समाजवादी पार्टी में साइकिल की सवारी करते-करते अब संगठन की अंदरूनी राजनीति का नया मोड़ सामने आ गया है। बस्ती में जिला संगठन के भीतर ऐसा सियासी घटनाक्रम हुआ है कि चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। जिला उपाध्यक्ष राघवेन्द्र सिंह को पार्टी के सभी दायित्वों से मुक्त करते हुए निष्कासित करने का पत्र जारी हुआ है। पत्र पर जिलाध्यक्ष एवं बस्ती सदर विधायक महेंद्र नाथ यादव के हस्ताक्षर हैं। कार्रवाई के लिए राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और प्रदेश अध्यक्ष श्याम लाल पाल के निर्देशों का हवाला दिया गया है।
टिकट मांगा तो संगठन से ही छुट्टी?
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प मोड़ राघवेन्द्र सिंह के आरोपों से आया है। उनका दावा है कि वह वर्ष 1994-95 से समाजवादी पार्टी से जुड़े हैं और लंबे समय से संगठन में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं। उन्होंने बस्ती सदर विधानसभा क्षेत्र संख्या 310 से टिकट की दावेदारी भी की थी। अब उनका आरोप है कि इसी दावेदारी के बाद उनके खिलाफ कार्रवाई की गई।
यानी मामला केवल पद जाने का नहीं, बल्कि राजनीतिक महत्वाकांक्षा और संगठन के भीतर की खींचतान का भी नजर आ रहा है। हालांकि, टिकट की दावेदारी ही निष्कासन की वजह थी या इसके पीछे कोई अन्य कारण है, इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
इस्तीफा देने को तैयार थे, फिर निष्कासन का झटका क्यों?
राघवेन्द्र सिंह ने सोशल मीडिया पर अपनी बात रखते हुए कहा कि वह खुद पद से इस्तीफा देने को तैयार थे, लेकिन जिस तरीके से निष्कासन की कार्रवाई की गई, वह उन्हें उचित नहीं लगा। उन्होंने इसे अपने खिलाफ राजनीतिक साजिश बताया और कहा कि वह पार्टी नेतृत्व के सामने अपनी बात रखेंगे।
उनका कहना है कि जब तक प्रदेश या राष्ट्रीय नेतृत्व की ओर से अंतिम निर्णय नहीं होता, तब तक वह इस निष्कासन को स्वीकार नहीं करेंगे।
अब सियासी गलियारों में सवाल यह उठ रहा है कि जब पद छोड़ने की तैयारी थी, तो मामला इस्तीफे पर क्यों नहीं सिमटा और निष्कासन तक कैसे पहुंच गया? इस सवाल का जवाब फिलहाल संगठन की ओर से सार्वजनिक नहीं किया गया है।
पुराने कार्यकर्ता बनाम संगठन का फैसला!
राघवेन्द्र सिंह ने पुराने कार्यकर्ताओं के सम्मान का मुद्दा भी उठाया है। उनका कहना है कि संगठन में लंबे समय तक संघर्ष करने वाले कार्यकर्ताओं को उचित महत्व मिलना चाहिए। उनके समर्थन में सोशल मीडिया पर भी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। समर्थकों ने संगठन की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए सक्रिय कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता देने की मांग की है।
उधर, निष्कासन पत्र में कार्रवाई का विस्तृत कारण नहीं बताया गया है। उसमें राष्ट्रीय और प्रदेश नेतृत्व के निर्देशों का उल्लेख किया गया है। ऐसे में विवाद का दूसरा पक्ष और कार्रवाई के पीछे संगठन का विस्तृत तर्क सामने आना अभी बाकी है।
बस्ती की सियासत में अब आगे क्या?
फिलहाल समाजवादी पार्टी के भीतर यह घटनाक्रम चर्चा का विषय बना हुआ है। एक तरफ राघवेन्द्र सिंह अपने पुराने राजनीतिक सफर और टिकट की दावेदारी का हवाला दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ जिला संगठन का निष्कासन संबंधी फैसला सामने है।
अब देखना यह काफी रोचक होगा कि राघवेन्द्र सिंह की शिकायत पर प्रदेश या राष्ट्रीय नेतृत्व क्या रुख अपनाता है और क्या इस विवाद का कोई समाधान निकलता है। फिलहाल बस्ती की सियासत में सवालों की कतार लगी है—टिकट की दावेदारी का असर था, संगठनात्मक अनुशासन का मामला था या फिर अंदरखाने कोई और सियासी कहानी चल रही थी?
इन सवालों का जवाब आधिकारिक स्पष्टीकरण के बाद ही साफ हो सकेगा।
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