
Gyan Prakash Dubey
उत्तर प्रदेश में ‘नीले ड्रम’ का खौफ: अपराध से मज़ाक तक
उत्तर प्रदेश में इन दिनों ‘नीले ड्रम’ का आतंक चरम पर है। मेरठ में मुस्कान और साहिल द्वारा सौरभ की हत्या कर शव को नीले ड्रम में पैक करने की घटना के बाद यह महज़ एक आपराधिक मामला नहीं रह गया, बल्कि समाज में चर्चा और डर का प्रतीक बन चुका है। सोशल मीडिया से लेकर आम जनजीवन तक, हर जगह इस घटना की गूंज सुनाई दे रही है।
नीले ड्रम का मनोवैज्ञानिक असर
इस घटना के बाद से कई घरों में पत्नियाँ अपने पतियों को मज़ाक में ‘नीले ड्रम’ की धमकी देने लगी हैं। कई सोशल मीडिया पोस्ट्स में महिलाओं को यह कहते सुना गया कि, “ज़्यादा उछल-कूद करोगे तो नीले ड्रम में चले जाओगे!” यह बताता है कि यह घटना अब एक ट्रेंड बन चुकी है। लेकिन यह सिर्फ़ मज़ाक नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक प्रवृत्ति को भी उजागर करता है।
अपराध का नया तरीका या चेतावनी?
इस केस ने अपराध की एक नई प्रवृत्ति को जन्म दिया है। पहले भी अपराधी शव ठिकाने लगाने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाते रहे हैं, लेकिन इस तरह किसी को ड्रम में पैक करना न केवल डरावना है, बल्कि एक नई चुनौती भी पेश करता है। पुलिस भी मान रही है कि ऐसे मामलों से निपटने के लिए नई रणनीतियाँ बनानी होंगी।
सोशल मीडिया पर मीम्स और बहस
इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़ आ गई। एक तरफ लोग इस गंभीर अपराध पर चर्चा कर रहे हैं, तो दूसरी ओर इसे लेकर चुटकी भी ले रहे हैं। लेकिन यह मज़ाक कहीं न कहीं समाज की उस मानसिकता को दिखाता है जहाँ अपराध भी मनोरंजन का हिस्सा बन जाता है।
आगे क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की घटनाएँ केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं होतीं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने में बदलाव की भी सूचक होती हैं। ऐसे मामलों में क़ानूनी कार्रवाई के साथ-साथ समाज में जागरूकता फैलाने की ज़रूरत भी होती है।
मेरठ की यह घटना एक चेतावनी भी है कि अपराध कितना भी सनसनीखेज़ हो, वह मज़ाक का विषय नहीं होना चाहिए। ‘नीला ड्रम’ अब केवल एक वस्तु नहीं रहा, बल्कि समाज में डर और चर्चा का प्रतीक बन गया है।
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