
प्रधानमंत्री और RSS पर विवादित कार्टून बनाने वाले कार्टूनिस्ट हेमंत मालवीय को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं, अगली सुनवाई 15 जुलाई को
नई दिल्ली, 14 जुलाई 2025
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उसके दुरुपयोग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में आज एक अहम टिप्पणी सामने आई, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भगवान शिव को लेकर आपत्तिजनक कार्टून और टिप्पणियों के मामले में फंसे इंदौर निवासी कार्टूनिस्ट हेमंत मालवीय को अदालत ने अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया।
जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस अरविंद कुमार की पीठ ने इस मामले में सुनवाई करते हुए तीखी टिप्पणी की और कहा, “कार्टूनिस्ट और स्टैंड-अप कॉमेडियन अभिव्यक्ति की आजादी का दुरुपयोग कर रहे हैं। इनमें संवेदनशीलता का अभाव दिखाई देता है।” अदालत ने साफ कहा कि वो इस मामले में अंतरिम जमानत या गिरफ्तारी पर रोक लगाने जैसा कोई आदेश नहीं देगी। अब इस केस की अगली सुनवाई 15 जुलाई को होगी।
मालवीय की ओर से पेश वरिष्ठ वकील वृंदा ग्रोवर ने अदालत से अनुरोध किया कि यह महज एक कार्टून है, जिससे किसी तरह का अपराध नहीं बनता। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा कि इस तरह की अभिव्यक्तियाँ देश के सामाजिक सौहार्द को बिगाड़ती हैं और बाद में लोग माफी मांगकर कानूनी प्रक्रिया से बचने की कोशिश करते हैं।
क्या है मामला?
हेमंत मालवीय पर आरोप है कि उन्होंने अपने फेसबुक अकाउंट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, आरएसएस और भगवान शिव को लेकर आपत्तिजनक कार्टून, वीडियो और टिप्पणियाँ साझा की थीं। इसे लेकर इंदौर के लसूड़िया थाना क्षेत्र में आरएसएस कार्यकर्ता विनय जोशी ने उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में कहा गया कि यह सामग्री न केवल प्रधानमंत्री और संघ को अपमानित करती है, बल्कि हिंदू धार्मिक भावनाओं को भी ठेस पहुंचाती है।
इससे पहले मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने भी मालवीय की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की थी कि उन्होंने अभिव्यक्ति की आज़ादी का अनुचित इस्तेमाल किया है और उन्हें अपने कैरिकेचर बनाते समय विवेक का परिचय देना चाहिए था।
अदालत की चेतावनी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश की कानूनी और सामाजिक व्यवस्था को चोट पहुंचाने वाली गतिविधियों को “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” की आड़ में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। जस्टिस धूलिया ने तीखे शब्दों में पूछा – “आप ये सब क्यों करते हैं?”
बड़ी बहस: अभिव्यक्ति की आज़ादी बनाम सामाजिक ज़िम्मेदारी
इस केस ने एक बार फिर देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक उत्तरदायित्व के संतुलन को लेकर बहस को हवा दे दी है। यह मामला दर्शाता है कि जहां एक ओर रचनात्मक स्वतंत्रता जरूरी है, वहीं उसका दायरा कानून, मर्यादा और सामाजिक सौहार्द के भीतर रहना भी उतना ही जरूरी है।
अब सभी की नजरें 15 जुलाई पर टिकी हैं, जब यह तय होगा कि हेमंत मालवीय को अग्रिम जमानत दी जाएगी या नहीं।
NGV PRAKASH NEWS

