जंगे आजादी पर विशेष रिपोर्ट…


महुआ डाबर: मिटा दिया गया गांव, लेकिन उसकी सांसें आज भी ज़िंदा हैं
NGV PRAKASH NEWS | बस्ती, 3 अगस्त 2025
1857 की क्रांति में एक ऐसा गांव था, जिसे अंग्रेजों ने पूरी तरह मिटा दिया। नाम तक नक्शे से गायब कर दिया गया। उस गांव का नाम था महुआ डाबर। आजादी के 77 साल बाद भी यह गांव अपने न्याय का इंतजार कर रहा है। और अब, आज रात 9:30 बजे, आकाशवाणी महानिदेशालय, दिल्ली से प्रसारित होने वाला विशेष रेडियो रूपक — “महुआ डाबरः निशां अभी बाक़ी हैं” — इस भूले-बिसरे जनसंहार की गूंज को फिर जीवित करेगा।
इस रूपक की लेखिका और प्रस्तुतकर्ता नवोदिता मिश्रा हैं। तकनीकी सहयोग आकाशवाणी गोरखपुर ने दिया है और संयोजन राम अवतार बैरवा ने किया है। इसे आप एफएम गोल्ड, इंद्रप्रस्थ चैनल, आकाशवाणी लाइव न्यूज 24×7, यूट्यूब चैनल और ‘न्यूज़ ऑन एयर’ ऐप पर सुन सकते हैं।
जब महुआ डाबर को इतिहास से मिटा दिया गया
3 जुलाई 1857—अंग्रेजी हुकूमत ने महुआ डाबर को चारों ओर से घेरकर आग में झोंक दिया।
- बूढ़े, बच्चे और महिलाएं—किसी को नहीं बख्शा गया।
- पूरे गांव की संपत्ति जब्त कर ली गई।
- गांव को ‘ग़ैर चिरागी’ घोषित कर दिया गया—मतलब वहां कोई दोबारा बस भी नहीं सकता था।
ब्रिटिश सरकार की यह क्रूरता इसलिए थी, क्योंकि महुआ डाबर के वीरों ने 10 जून 1857 को मनोरमा नदी के पास अंग्रेजी अफसरों पर हमला कर दिया था, जिसमें लेफ्टिनेंट इंग्लिश और कई अंग्रेज अफसर मारे गए।
समृद्धि और संस्कृति का केंद्र था महुआ डाबर
1857 से पहले महुआ डाबर सिर्फ गांव नहीं, एक समृद्ध शहरी बस्ती था—
- छींट कपड़े की बुनाई, रंगाई और छपाई का अंतरराष्ट्रीय केंद्र
- 5000 की आबादी, जिनमें ज्यादातर कारीगर और व्यापारी
- पीतल के बर्तनों का बाजार, अनाज मंडी, स्कूल और ऊंची मीनारों वाली मस्जिदें
लेकिन 3 जुलाई 1857 को यह सब राख में बदल गया।
नक्शे से गायब और झूठे इतिहास की चाल
ब्रिटिश सरकार ने असली महुआ डाबर को खत्म करने के बाद बस्ती-गोंडा सीमा पर एक और गांव बसाया, उसका नाम भी महुआ डाबर रख दिया। 1907 के बस्ती गजेटियर में इसे असली गांव बताकर झूठ दर्ज कर दिया गया। आज भी कई लोग नहीं जानते कि असली महुआ डाबर कहां था।
इतिहास को बचाने की कोशिशें
- 1999 में महुआ डाबर संग्रहालय की स्थापना हुई।
- 2010 में उत्खनन के दौरान राख, जले लकड़ी के टुकड़े, मिट्टी के बर्तन और सिक्के मिले।
- डॉ. शाह आलम राना के प्रयास से यह स्थल उत्तर प्रदेश पर्यटन नीति 2022 के स्वतंत्रता संग्राम सर्किट में शामिल हुआ।
- 10 जून 2025 से यहां शस्त्र सलामी भी दी जाने लगी है।
डॉ. राना कहते हैं—
“जालियांवाला बाग से बड़ी यह त्रासदी अब भी न्याय की प्रतीक्षा कर रही है। महुआ डाबर एक राष्ट्रीय स्मारक बनने का इंतजार कर रहा है।”
आज का रेडियो रूपक: इतिहास की सांसें
आज रात 9:30 बजे प्रसारित होने वाला “महुआ डाबरः निशां अभी बाक़ी हैं” सिर्फ एक रेडियो कार्यक्रम नहीं, बल्कि हमारी ऐतिहासिक चेतना को झकझोरने वाला दस्तावेज़ है।
यह कार्यक्रम हमें याद दिलाता है कि कुछ गांव मिटते नहीं, उनकी सांसें समय के पार भी जीवित रहती हैं।
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