

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को ठहराया सही…
बिहार SIR पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: “आधार नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं”
नई दिल्ली 12 अगस्त 25।
बिहार में मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) अभियान को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अहम टिप्पणी की। जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने चुनाव आयोग के रुख को सही ठहराते हुए साफ कहा कि आधार को नागरिकता का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता, बल्कि इसकी सत्यापन प्रक्रिया जरूरी है।
मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत ने सवाल किया कि यदि बिहार के पास पर्याप्त नागरिकता संबंधी दस्तावेज नहीं हैं, तो अन्य राज्यों में भी स्थिति अलग नहीं होगी। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि केंद्र सरकार के कर्मचारी के पास स्थानीय निकाय या एलआईसी द्वारा जारी पहचान पत्र जैसे दस्तावेज होते हैं, जिन्हें आधार के बजाय नागरिकता सत्यापन में देखा जाना चाहिए।
कपिल सिब्बल ने रखी जनगणना जैसी तस्वीर
वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने अदालत को बताया कि देश में बहुत कम लोगों के पास नागरिकता साबित करने वाले दस्तावेज मौजूद हैं। उनके अनुसार —
- जन्म प्रमाण पत्र: केवल 3.056% लोगों के पास
- पासपोर्ट: 2.7%
- मैट्रिकुलेशन प्रमाणपत्र: 14.71%
सिब्बल ने कहा कि जब इतने कम लोगों के पास दस्तावेज हैं, तो बड़े पैमाने पर पहचान और नागरिकता सिद्ध करना मुश्किल होगा।
65 लाख लोगों का नाम हटाया?
वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायण ने अदालत को बताया कि बिहार में SIR प्रक्रिया के दौरान 65 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बड़े पैमाने पर हटाए जाने के दावे तथ्यों और आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर ही जांचे जाएंगे।
‘जिंदा लोगों को मृत दिखाया गया’
कपिल सिब्बल ने यह भी आरोप लगाया कि एक निर्वाचन क्षेत्र में 12 लोग ऐसे हैं जिन्हें रिकॉर्ड में मृत दिखा दिया गया, जबकि वे जीवित हैं। इस पर चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने कहा कि यह सिर्फ ड्राफ्ट रोल है और इतनी बड़ी प्रक्रिया में कुछ गलतियां होना स्वाभाविक है, लेकिन जीवित को मृत बताना गलत है।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से यह भी पूछा कि मृत घोषित किए गए लोगों की सटीक संख्या क्या है और इस त्रुटि को कैसे सुधारा जाएगा।
कानूनी वैधता पर भी सवाल
पीठ ने स्पष्ट किया कि पहले यह तय करना होगा कि SIR प्रक्रिया कानून के मुताबिक है या नहीं। अगर यह किसी सशर्त योजना के तहत मंजूर है, तो अदालत इसकी प्रक्रिया पर विचार करेगी; लेकिन अगर यह संवैधानिक ढांचे में नहीं आता, तो कार्रवाई उसी अनुसार होगी।
— NGV PRAKASH NEWS
