आखिर किसकी है वह बेनामी संपत्ति जिसके वजह से सहारा और सेबी में हो गया विवाद..

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सहारा इंडिया मामला: अदालत के आदेश, 25 हज़ार करोड़ रुपये और सुब्रत रॉय की गिरफ़्तारी — भारत की सबसे चर्चित वित्तीय गाथा

नई दिल्ली।
भारत के कॉरपोरेट इतिहास में “सहारा इंडिया मामला” ऐसा प्रकरण है जिसने एक साथ वित्तीय बाजार, न्यायपालिका, नियामक व्यवस्था और राजनीति — सभी को झकझोर दिया। सहारा समूह ने देशभर में करोड़ों लोगों से निवेश जुटाया, सुप्रीम कोर्ट ने रिफंड के आदेश दिए, सेबी ने जांच की, अरबों रुपये जमा भी हुए — लेकिन न तो निवेशकों को पूरी रकम लौट पाई और न ही मामला शांत हुआ।


📌 1. शुरुआत: OFCD के जरिए पूंजी जुटाना (2008–2010)

2008–2009 के बीच सहारा समूह की दो कंपनियों — Sahara India Real Estate Corporation Ltd. (SIRECL) और Sahara Housing Investment Corporation Ltd. (SHICL) — ने Optionally Fully Convertible Debentures (OFCD) के माध्यम से लगभग ₹17,400 से ₹25,000 करोड़ रुपये तक जुटाए।

OFCD एक ऐसा वित्तीय साधन है जिसे कंपनी भविष्य में शेयर में बदल सकती है या परिपक्वता पर वापस कर सकती है। सहारा ने इन इश्यूज़ को “प्राइवेट प्लेसमेंट” बताकर सेबी के नियमों से बाहर दिखाने की कोशिश की, जबकि वास्तविकता में लाखों निवेशकों को जोड़ा गया था।

👉 सेबी के बीच में आने के बाद निवेशकों के पैसे को कंपनी द्वारा कम समय में अधिक ब्याज का लालच देकर बगैर भुगतान किए पेपर पर ही उसे दूसरे स्कीम में ट्रांसफर कर दिया गया | और पेपर में खुद को साफ सुथरा दिखा दिया गया साथ ही कहा गया कि वह पैसा निवेशकों को भुगतान कर रहे हैं लेकिन निवेशक अपनी इच्छा से फिर पैसा उनके कंपनी में इन्वेस्ट कर रहे हैं | जबकि ऐसा नहीं था | कंपनी के एजेंट निवेशकों को बरगलाकर उनका पैसा अपनी कमीशन के लालच में पुनः दूसरे स्कीमों में डाल दे रहे थे |


📌 2. सेबी की एंट्री और कानूनी विवाद (2010–2012)

2010 में भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के संज्ञान में मामला आया। सेबी ने माना कि यह स्कीमें उसकी नियामकीय परिधि में आती हैं और बिना अनुमति निवेश जुटाना अवैध है।

सहारा ने तर्क दिया कि यह पब्लिक इश्यू नहीं बल्कि प्राइवेट प्लेसमेंट है, इसलिए सेबी के नियम लागू नहीं होते। मामला SAT और दिल्ली हाईकोर्ट से होता हुआ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

👉 यहां पर कुछ लोगों का कहना है कि सहारा में कुछ पार्टियों का पैसा जमा था जिसे वह चुनाव के वक्त खर्च करते परंतु उनकी जमा फार्म पर केवल पाते में रायबरेली लिखा था जिसके कारण सुब्रत राय ने पैसा देने से इनकार कर दिया | उसके बाद ही सेबी की एंट्री हुई और सुब्रत राय को जेल जाना पड़ा |


📌 3. सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश (31 अगस्त 2012)

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि सहारा की कंपनियों द्वारा लाखों निवेशकों से जुटाई गई राशि सेबी के नियमों के तहत आती है। अदालत ने आदेश दिया कि —

  • सहारा समूह निवेशकों को पैसा वापस करे।
  • पूरी रकम 3 महीनों में सेबी के पास जमा करे।
  • पहले से किए गए भुगतान का प्रमाण प्रस्तुत करे।
  • भविष्य में ऐसी स्कीमों पर रोक लगाई जाए।

➡️ निवेशकों की पहचान और राशि की जांच की जिम्मेदारी सेबी को सौंपी गई।


📌 4. रिकॉर्ड में गड़बड़ी (2013)

सहारा ने दावा किया कि उसने 90% निवेशकों को पैसा लौटा दिया है, लेकिन सेबी की जांच में भारी विसंगतियाँ सामने आईं —

  • लाखों फॉर्म अधूरे, बेनाम या डुप्लीकेट थे।
  • कई फॉर्मों में पते या संपर्क विवरण नहीं थे।
  • एक ही नाम और पते के साथ कई प्रविष्टियाँ मिलीं।

इससे वास्तविक निवेशकों की पहचान लगभग असंभव हो गई।


📌 5. अदालत की सख़्ती और सुब्रत रॉय की गिरफ्तारी (2014)

सुप्रीम कोर्ट ने सुब्रत रॉय को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर आदेशों के अनुपालन पर जवाब देने को कहा।

26 फरवरी 2014 को अनुपस्थित रहने पर उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ।
4 मार्च को लखनऊ से गिरफ़्तार कर उन्हें दिल्ली लाया गया और तिहाड़ जेल भेजा गया।

👉 यह गिरफ्तारी किसी निवेशक की शिकायत पर नहीं, बल्कि अदालत की अवमानना (Contempt of Court) के कारण हुई थी।


📌 6. ₹20,000 करोड़ जमा — लेकिन रिफंड रुका क्यों?

सहारा समूह ने करीब ₹20,000 करोड़ रुपये सेबी के पास जमा किए, फिर भी निवेशकों को रिफंड नहीं मिला। कारण तीन प्रमुख थे —

  1. कम दावेदार — 2014 में सिर्फ लगभग 4,600 निवेशकों ने ही दावे किए।
  2. संदिग्ध दस्तावेज़ — कई रिकॉर्ड अधूरे या फर्जी पाए गए।
  3. कानूनी जटिलता — सुप्रीम कोर्ट ने सत्यापित निवेशकों को ही भुगतान की अनुमति दी, जिससे प्रक्रिया बेहद धीमी हो गई।

➡️ नतीजतन, अरबों रुपये सेबी के पास पड़े हैं लेकिन वास्तविक दावेदार सामने नहीं आए या प्रमाणित नहीं हो पाए।


📌 7. राजनीतिक और सामाजिक परतें

सुब्रत रॉय उस समय देश के सबसे प्रभावशाली उद्योगपतियों में गिने जाते थे। उन्होंने कई राजनीतिक दलों से निकटता बनाए रखी। लखनऊ का सहारा शहर, लक्ज़री एयरक्राफ्ट और ग्लैमरस ब्रांडिंग ने उन्हें प्रतीक बना दिया।

मीडिया में यह भी अटकलें लगीं कि उनके खिलाफ कार्रवाई में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की भूमिका रही, हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार स्पष्ट किया कि मामला केवल कानूनी आदेशों के अनुपालन का है।


📌 8. “बेनामी फॉर्म” विवाद और राशि का रहस्य

कई फॉर्मों में “राम कुमार”, “सीता देवी” जैसे सामान्य नाम बिना पते के पाए गए। सेबी ने कहा कि ऐसे निवेशकों की पहचान संभव नहीं।

कुछ लोगों के पते में केवल रायबरेली लिखा था |

सहारा का दावा था कि उसने पहले ही इन्हें भुगतान कर दिया है।
यहीं से “₹20,000 करोड़ सेबी में जमा है, कोई लेने नहीं आ रहा” वाली स्थिति बनी।


📌 9. मौजूदा स्थिति (2023–2025)

मामला अभी भी समाप्त नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सेबी रिफंड प्रक्रिया चला रही है। सरकार सहारा की संपत्तियों की बिक्री कर कुछ राशि वापस करने पर विचार कर रही है। वास्तविक निवेशकों की पहचान और रकम के उपयोग की जांच जारी है।

👉 वहीं सूत्रों के अनुसार कागजों में शहर का भुगतान चल रहा है परंतु हकीकत इससे कोसो दूर है |


📝 निष्कर्ष

सहारा इंडिया मामला केवल एक कारोबारी समूह का विवाद नहीं, बल्कि भारत की वित्तीय पारदर्शिता, न्यायिक सख़्ती और जटिल निवेश ढांचों की गाथा है।

सुब्रत रॉय की गिरफ्तारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि अदालत के आदेशों की अवहेलना करने वाला कोई भी व्यक्ति — चाहे कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो — कानून से ऊपर नहीं है।

दूसरी ओर, यह मामला यह भी दर्शाता है कि जब लाखों निवेशकों के रिकॉर्ड ही अधूरे हों तो अरबों रुपये लौटाना भी कितना कठिन हो सकता है।

✍️ NGV PRAKASH NEWS


👉 लेख : इंटरनेट पर उपलब्ध विभिन्न स्रोतों पर आधारित..

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