
NGV PRAKASH NEWS
नई दिल्ली, 11 जनवरी 2026 —
आमतौर पर एमआरआई मशीन को हड्डियों, दिमाग और गंभीर बीमारियों की जांच से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन एक वैज्ञानिक प्रयोग ऐसा भी हुआ जिसने यह धारणा बदल दी कि इस तकनीक का उपयोग केवल बीमारी पहचानने तक सीमित है। यह कोई कल्पना या फिल्मी दृश्य नहीं, बल्कि एक वास्तविक शोध था जिसने मेडिकल साइंस की दुनिया में खासा ध्यान खींचा।
यह मामला वर्ष 1991 का है, जब नीदरलैंड के वैज्ञानिक मेनको विक्टर ‘पेक’ वैन एंडेल मानव शरीर में होने वाले सूक्ष्म बदलावों को और गहराई से समझना चाहते थे। इस शोध में उनकी सहयोगी आइडा साबेलिस और उनके साथी जु्प ने भाग लिया। उद्देश्य यह था कि करीबी मानवीय पलों के दौरान शरीर के भीतर किस तरह के शारीरिक परिवर्तन होते हैं और उन्हें एमआरआई तकनीक से किस हद तक देखा और समझा जा सकता है।
रिसर्च के तहत यह तय किया गया कि कपल एमआरआई मशीन के भीतर रहेगा और उसी समय शरीर के अंदर होने वाले बदलावों की इमेजिंग की जाएगी। यह पूरा प्रयोग वैज्ञानिक निगरानी और तय प्रोटोकॉल के तहत किया गया था। हालांकि इसमें सबसे बड़ी चुनौती मशीन की बेहद सीमित जगह थी, क्योंकि उस समय की एमआरआई मशीनें आज की तरह चौड़ी और आरामदेह नहीं थीं।
सीमित स्थान के कारण शोधकर्ताओं को ऐसी स्थिति अपनानी पड़ी जिससे दोनों मशीन के भीतर समा सकें और साथ ही जरूरी इमेजिंग भी संभव हो सके। कंट्रोल रूम से वैज्ञानिक लगातार निर्देश देते रहे ताकि तस्वीरें स्पष्ट मिल सकें और डेटा उपयोगी रहे।
इस अनोखे प्रयोग के नतीजे वर्ष 1999 में प्रतिष्ठित ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित किए गए। इन निष्कर्षों ने खासतौर पर महिलाओं के शरीर से जुड़ी वैज्ञानिक समझ को बेहतर बनाने में मदद की और मेडिकल समुदाय में इस पर व्यापक चर्चा हुई।
कई साल बाद आइडा साबेलिस ने एक पॉडकास्ट में इस अनुभव को याद करते हुए इसे “अजीब लेकिन यादगार” बताया। उन्होंने कहा कि शुरुआत में सब कुछ योजना के अनुसार नहीं चल पाया और मशीन के भीतर फिट होना ही सबसे बड़ी चुनौती थी, लेकिन अंततः यह अनुभव विज्ञान के लिए उपयोगी और महत्वपूर्ण साबित हुआ।
NGV PRAKASH NEWS
👉 समाचार स्रोत…. सोशल मीडिया, तथा अन्य
