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“डॉक्टर साहब, biopsy करानी पड़ेगी? कहीं इससे बीमारी बढ़ तो नहीं जाएगी…”
अस्पताल ओपीडी में यह सवाल रोज़ सुनाई देता है। जहां डॉक्टर के सामने बैठा मरीज बोल तो रहा होता है, लेकिन उसके मन में डर, असमंजस और अनगिनत आशंकाएँ चल रही होती हैं।
कभी किसी रिश्तेदार ने कह दिया होता है कि biopsy से कैंसर फैल जाता है, किसी ने डराया होता है कि अगर रिपोर्ट खराब आ गई तो ज़िंदगी बदल जाएगी। सच यह है कि ज़्यादातर मरीज बीमारी से कम और अधूरी जानकारी से ज़्यादा डरते हैं।
एक्सपर्ट के मुताबिक जब शरीर के किसी हिस्से में गांठ बन जाए, सूजन लंबे समय तक बनी रहे, कोई घाव ठीक न हो, बार-बार खून आए या इलाज के बावजूद समस्या जस की तस रहे, तब डॉक्टर biopsy की सलाह देते हैं। biopsy का मतलब है—संदिग्ध जगह से बहुत ही छोटा सा टिशू या कुछ कोशिकाएँ लेकर माइक्रोस्कोप से जाँच करना, ताकि यह साफ हो सके कि मामला साधारण सूजन का है, संक्रमण का है, टीबी है, कैंसर है या कोई दूसरी बीमारी।
अक्सर लोगों को लगता है कि biopsy कोई बड़ा ऑपरेशन होता है, लेकिन आज की चिकित्सा में ज़्यादातर biopsies बेहद आसान और सुरक्षित हैं। कई मामलों में केवल पतली सुई से कुछ कोशिकाएँ ली जाती हैं, जिसे needle biopsy कहा जाता है। पेट या आंतों की समस्या में एंडोस्कोपी या कोलोनोस्कोपी के दौरान ही biopsy कर ली जाती है, जिसमें मरीज को हल्की दवा देकर आराम की अवस्था में रखा जाता है। त्वचा की biopsy तो इतनी छोटी होती है कि कई बार टांके की भी ज़रूरत नहीं पड़ती। अधिकांश मरीज उसी दिन घर लौट जाते हैं।
biopsy की ज़रूरत तब पड़ती है, जब लक्षण गंभीर संकेत दे रहे हों—जैसे लगातार बढ़ती गांठ, लंबे समय से न भरने वाला घाव, बिना कारण वजन घटना, बार-बार खून आना, लंबे समय से पेट दर्द या दस्त, या रिपोर्ट्स में किसी बड़ी बीमारी का शक। डॉक्टर के लिए biopsy सबसे भरोसेमंद तरीका होता है, क्योंकि इसके बिना बीमारी का सही कारण सिर्फ अंदाज़ा ही रहता है।
biopsy केवल कैंसर के लिए ही नहीं की जाती। टीबी, लिवर और किडनी की बीमारियाँ, ब्रेस्ट या थायरॉइड की गांठ, आंतों की सूजन वाली बीमारियाँ, लंबे समय से चल रही त्वचा की समस्या—इन सब में biopsy सही diagnosis का रास्ता खोलती है। कई बार मरीज महीनों या सालों तक दवाइयाँ खाते रहते हैं, लेकिन असली बीमारी biopsy के बाद ही पकड़ में आती है।
सबसे बड़ा डर यही होता है कि biopsy से कैंसर फैल जाएगा। यह एक आम लेकिन पूरी तरह गलत धारणा है। आधुनिक चिकित्सा में ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि biopsy से कैंसर फैलता है। बीमारी अगर है, तो वह पहले से मौजूद होती है; biopsy सिर्फ उसका सच सामने लाती है। सच से मुँह मोड़ लेने से बीमारी खत्म नहीं होती।
कुछ और भ्रांतियाँ भी आम हैं—जैसे biopsy का मतलब कैंसर पक्का, या यह बहुत दर्दनाक प्रक्रिया है, या इसे टाल देने से अपने आप ठीक हो जाएगा। हकीकत यह है कि biopsy जितनी देर से होगी, सही इलाज उतनी ही देर से शुरू होगा। और इलाज में देरी ही असली खतरा बनती है।
समय पर biopsy कराना डर की बात नहीं, बल्कि समझदारी का फैसला है। सही diagnosis ही सही इलाज की पहली सीढ़ी होता है—और biopsy उसी सीढ़ी की नींव है।
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👉 लेख विभिन्न विशेषज्ञों के द्वारा मिली जानकारी पर आधारित
