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झोलाछाप बनाम मल्टी स्पेशलिटी और बिना मान्यता स्कूलों का फैलता जाल, व्यवस्था पर उठ रहे सवाल

बड़े-बड़े बैनर लगाए मल्टी स्पेशलिटी हॉस्पिटल में हो रही मौतों पर जहां प्रशासन शांत रहता है | वही मार्च महीना लगता ही गली मोहल्लों में खुले कुकुरमुत्तों की तरह प्राइवेट स्कूल लोगों को लुभाकर चूसने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते |
देश में स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। एक ओर ग्रामीण इलाकों में प्राथमिक उपचार करने वाले छोटे डॉक्टरों पर सख्ती दिखाई जाती है, वहीं दूसरी ओर शहरों में कथित मल्टी स्पेशलिटी अस्पतालों और गली-मोहल्लों में खुले निजी स्कूलों की बाढ़ सी आ गई है।
दोनों मामले में प्रशासन द्वारा कार्रवाई का पैमाना अलग-अलग नजर आता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में वर्षों से प्राथमिक उपचार, मलहम-पट्टी और सामान्य दवाओं के जरिए लोगों की मदद करने वाले डॉक्टरों पर समय-समय पर छापेमारी की जाती है। स्वास्थ्य विभाग ऐसे चिकित्सकों को झोलाछाप की श्रेणी में रखकर कार्रवाई करता है। गांवों के लोगों का कहना है कि जहां सरकारी अस्पताल कई किलोमीटर दूर हैं और एम्बुलेंस समय से नहीं पहुंच पाती, वहां यही छोटे डॉक्टर शुरुआती राहत देते हैं। हालांकि चिकित्सा विशेषज्ञों का तर्क है कि बिना मान्यता और डिग्री के इलाज करना कानूनन अपराध है और इससे मरीजों की जान जोखिम में पड़ सकती है।
दूसरी तरफ शहरों में मल्टी स्पेशलिटी के नाम पर लगातार नए अस्पताल खुल रहे हैं। बड़े-बड़े होर्डिंग और विज्ञापन के जरिए विशेषज्ञ डॉक्टरों की लंबी सूची प्रदर्शित की जाती है, लेकिन मरीजों का आरोप है कि जरूरत के समय विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं रहते पूरा इलाज फार्मासिस्ट और नर्सिंग स्टाफ के भरोसे होता है। ऐसे हॉस्पिटलों में इलाज और जांच के नाम पर भारी भरकम बिल थमा दिए जाते हैं। कई मामलों में परिवारों को जमीन गिरवी रखने या कर्ज लेने तक की नौबत आ जाती है।
कई मामले ऐसे भी सुनने में आए हैं जहां पर मरीज को जबरदस्ती वेंटिलेटर पर रहकर लाखों रुपए बना लिए जाते हैं और बाद में जब मरीज की मृत्यु हो जाती है तो परिजनों से बगैर पैसे वसूल बॉडी तक नहीं देते |
हालांकि निजी अस्पताल यह प्रचार करते हैं कि उनके यहां आधुनिक चिकित्सा उपकरण, विशेषज्ञ स्टाफ और 24 घंटे की सेवायें विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा दी जा रही है।
📍 यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि प्राइवेट हॉस्पिटल में हो रही मौतों प्रशासन आंख बंद कर लेता है | वहीं लोगों का कहना है कि मोटी रकम देकर ऐसे हॉस्पिटल कार्रवाई से बच जाते हैं |
स्वास्थ्य व्यवस्था की तरह शिक्षा क्षेत्र में भी अनियंत्रित विस्तार देखने को मिल रहा है। कस्बों और गांवों में प्लेवे, कान्वेंट और पब्लिक स्कूल के नाम पर संस्थान खुल रहे हैं। इनमें से कई स्कूलों की मान्यता केवल प्राथमिक या जूनियर स्तर तक सीमित होती है, जबकि प्रचार-प्रसार ऐसे किया जाता है मानो वे पूर्ण मान्यता प्राप्त बड़े संस्थान हों। अभिभावकों से प्रवेश, यूनिफॉर्म, किताब, परिवहन और अन्य सुविधाओं के नाम पर मोटी फीस वसूली जाती है।
शिक्षकों को कम वेतन पर नियुक्त करने की भी शिकायतें सामने आती रहती हैं। 1000 से 5000 रुपये तक मासिक वेतन पर पढ़ाने वाले शिक्षकों से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की उम्मीद करना चुनौतीपूर्ण माना जाता है। कई अभिभावकों का कहना है कि नियमित कक्षाओं के बावजूद बच्चों को अतिरिक्त ट्यूशन का सहारा लेना पड़ता है, क्योंकि स्कूल स्तर पर पाठ्यक्रम पूरी तरह तैयार नहीं हो पाता।
विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या का मूल कारण निगरानी तंत्र की कमजोरी और नियमों का असमान पालन है। स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में संतुलित नीति, सख्त निरीक्षण और पारदर्शिता की जरूरत है। जहां अवैध और अनियमित संस्थानों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी को दूर करने के लिए वैकल्पिक और कानूनी समाधान भी तलाशने होंगे।
जनता के बीच यह बहस तेज हो गई है कि क्या व्यवस्था में दोहरा मापदंड अपनाया जा रहा है, या फिर नियंत्रण और संसाधनों की कमी के कारण यह स्थिति पैदा हुई है। फिलहाल सवाल यही है कि आम आदमी को सुलभ, सस्ती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य व शिक्षा सेवाएं कब और कैसे मिलेंगी।
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