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कासगंज के अमांपुर में एक ही घर की पांच चिताएं, आर्थिक तंगी और बीमारी ने उजाड़ दिया पूरा परिवार


कासगंज, 23 फरवरी 2026.
अमांपुर कस्बे की वह रात अब लंबे समय तक लोगों की स्मृतियों से मिट नहीं सकेगी। एक साधारण से घर के भीतर जमा होती निराशा, बेबसी और आर्थिक तंगी आखिरकार ऐसी त्रासदी में बदल गई, जिसने पूरे नगर को सन्न कर दिया। वेल्डिंग मिस्त्री सत्यवीर ने अपनी पत्नी और तीन मासूम बच्चों की हत्या करने के बाद स्वयं फांसी लगाकर जीवन समाप्त कर लिया। एक ही परिवार की पांच जिंदगियां एक साथ बुझ जाने से पूरे इलाके में मातम पसरा है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार सत्यवीर मध्यमवर्गीय किसान परिवार से था। उसके पिता नेम सिंह के चार बेटे—सत्यवीर, संतोष, सतीश और देशराज—और दो बेटियां हैं। करीब 12 बीघा जमीन और मेहनत की कमाई से घर चलता था। सत्यवीर ने भी पिता से वेल्डिंग का काम सीखा और मेहनत मजदूरी कर परिवार का गुजारा करता रहा। लगभग 16 वर्ष पहले उसका विवाह रामश्री उर्फ शीला से हुआ था। दो बेटियां और एक बेटा गिरीश उनके जीवन की उम्मीद थे।
लेकिन गिरीश की बीमारी ने इस परिवार की खुशियों को धीरे-धीरे निगल लिया। जन्म से ही कान की समस्या से जूझ रहे गिरीश का संक्रमण शरीर से होते हुए दिमाग तक पहुंच गया। पिछले तीन वर्षों से आगरा में उसका इलाज चल रहा था। इलाज पर लाखों रुपये खर्च हो चुके थे। बेटे को ठीक होते देखने की चाह में सत्यवीर ने पिता से करीब चार लाख रुपये लिए। बाद में कार दुर्घटना के क्लेम में मिले करीब सवा लाख रुपये भी उसी इलाज में खर्च हो गए। धीरे-धीरे घर की जमा पूंजी खत्म हो गई और बैंक खाता शून्य हो गया।
धनराशि को लेकर परिवार में खटास बढ़ने लगी। भाइयों ने भी पिता से बराबरी की मांग की। तनाव इतना बढ़ा कि दो वर्ष पहले जमीन का चारों भाइयों में बंटवारा कर दिया गया। इसके बाद चारों भाई अलग-अलग रहने लगे। रिश्तों की गर्माहट ठंडी पड़ गई और बोलचाल तक सीमित हो गई।
इधर गिरीश की हालत फिर बिगड़ने लगी। 16 फरवरी को उसे आगरा ले जाना था, जिसके लिए करीब 20 हजार रुपये की जरूरत थी। सत्यवीर ने अपने साढ़ू नंदकिशोर से मदद मांगी। एक साहूकार का पता बताया गया, लेकिन यह साफ नहीं हो सका कि उसे रकम मिल पाई या नहीं। गांव के लोग कहते हैं, अगर उस वक्त पैसों का इंतजाम हो जाता तो शायद यह त्रासदी टल जाती।
बताया जा रहा है कि आर्थिक दबाव, पारिवारिक मनमुटाव और बेटे की बिगड़ती हालत ने सत्यवीर को भीतर से तोड़ दिया था। घर में पैसों को लेकर तनाव बढ़ता जा रहा था। 14 फरवरी को गांव में एक शादी समारोह में पूरा परिवार शामिल हुआ था। किसी ने सोचा भी नहीं था कि दो दिन बाद यही परिवार हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।
घटना के बाद जब अंतिम संस्कार हुआ तो नेम सिंह की चीखें सुनकर हर आंख नम हो गई। एक पिता अपने बेटे, बहू और तीन पोते-पोतियों की चिताओं के सामने खड़ा था। गांव के लोग अब भी यही सवाल कर रहे हैं—क्या यह हादसा रोका जा सकता था? क्या समय रहते किसी ने हाथ बढ़ाया होता तो पांच जिंदगियां बच सकती थीं?
अमांपुर में अब सिर्फ सन्नाटा है, बंद दरवाजे हैं और उन दीवारों पर टंगी अधूरी उम्मीदें, जो हमेशा याद दिलाती रहेंगी कि आर्थिक तंगी और मानसिक तनाव का बोझ कभी-कभी इंसान को ऐसे अंधेरे में धकेल देता है, जहां से लौटना संभव नहीं होता।
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