Gyan Prakash Dubey NGV PRAKASH NEWS

त्योहारों पर ही क्यों जागता है खाद्य विभाग? मिलावट पर उठे गंभीर सवाल, कार्रवाई की निष्पक्षता पर बहस तेज
बस्ती, 02 मार्च 2026 — जनपद में खाद्य सुरक्षा विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि विभाग केवल होली, दीपावली और रक्षाबंधन जैसे बड़े त्योहारों के आसपास ही सक्रिय दिखाई देता है, जबकि वर्षभर बाजारों में दूध, पनीर, खोया, मिठाई और अन्य खाद्य पदार्थों की बिक्री लगातार होती रहती है। ऐसे में यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या मिलावट सिर्फ त्योहारों में ही होती है, या फिर नियमित जांच की व्यवस्था कागजों तक सीमित है।
👉हाल ही में 1 मार्च 26 को गौर थाना क्षेत्र के महुआ डाबर ग्राम में कथित रूप से एक कंपनी का केक खाने के बाद एक युवक की मौत और एक बच्चे के गंभीर रूप से बीमार होने का मामला सामने आया। घटना के बाद लोगों में आक्रोश है और खाद्य विभाग की सतर्कता पर गंभीर प्रश्न उठाए जा रहे हैं। स्थानीय व्यापारियों और उपभोक्ताओं का कहना है कि यदि नियमित जांच और सख्त निगरानी होती तो ऐसी घटनाओं पर अंकुश लगाया जा सकता था।
लोगों की माने तो विभाग की कार्रवाई अक्सर केवल खुले खाद्य पदार्थों तक सीमित रहती है, जबकि पैकेट बंद खाद्य सामग्री की जांच कम ही दिखाई देती है। बाजार में बिक रहे ब्रांडेड उत्पादों की गुणवत्ता और वैधता की जांच कितनी नियमित होती है, इसे लेकर भी पारदर्शिता की मांग उठ रही है।
➡️वहीं कुछ लोगों का आरोप है कि त्योहारों के समय ज्यादा छापेमारी इसलिए होती है क्योंकि उस दौरान बिक्री अधिक होती है और कार्रवाई का लोगों की नजर में ज्यादा दिखता है।
⏩वहीं, कुछ व्यापारिक सूत्रों का दावा है कि नियमित रूप से ‘मासिक व्यवस्था’ और त्योहार पर अधिक व्यवस्था की चर्चा बाजारों में आम है, हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि NGV PRAKASH NEWS नहीं करता है।
लोगों द्वारा आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि छोटी दुकानों पर कार्रवाई कर विभाग द्वारा औपचारिकता पूरी कर ली जाती है, जबकि बड़े कारोबारियों तक विभागीय सख्ती शायद ही पहुंचती है।
📍खाद्य विभाग और प्रशासन द्वारा समय-समय पर कुछ मात्रा में पनीर, खोया या मिठाई नष्ट कर कार्रवाई का प्रदर्शन किया जाता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इससे मिलावट की जड़ पर प्रहार होता है या केवल तात्कालिक संदेश देने की कोशिश की जाती है।
➡️विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सैंपलिंग और जांच प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और नियमित हो, तो मिलावट की प्रवृत्ति स्वतः कम हो सकती है।
इन आरोपों और चर्चाओं के बीच आवश्यक है कि खाद्य सुरक्षा विभाग स्पष्ट रूप से अपनी नियमित जांच प्रणाली, सैंपलिंग के आंकड़े और कार्रवाई की रिपोर्ट सार्वजनिक करे, ताकि उपभोक्ताओं का विश्वास बहाल हो सके। फिलहाल जनमानस में यह बहस तेज है कि क्या विभाग बड़ी घटना का इंतजार करता है या फिर व्यवस्था में व्यापक सुधार की जरूरत है।
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