अभिभावकों की महत्वाकांक्षा के आगे बेबस छात्र-बिशेष लेख


कोचिंग कल्चर बनाम प्राकृतिक शिक्षा: बीस वर्षों में बदल गया बच्चों के विकास का स्वरूप
पिछले दो दशकों में देश की शिक्षा प्रणाली में भारी बदलाव आया है। सरकारी स्कूलों की पारंपरिक व्यवस्था, जहां छात्रों को उनकी योग्यता व रुचि के अनुसार विषयों का चयन कराया जाता था, अब कोचिंग आधारित मॉडल में बदल चुकी है। विशेषज्ञों के अनुसार इस बदलाव ने बच्चों के मानसिक विकास, तनाव प्रबंधन और करियर विकल्पों की स्वतंत्रता पर गंभीर प्रभाव डाला है।
बीस वर्ष पहले तक अधिकतर सरकारी स्कूलों में विज्ञान, कला और वाणिज्य जैसे विषय छात्रों की बौद्धिक क्षमता और रुचि के अनुरूप दिए जाते थे। शिक्षक गलतियों पर सख्ती तो करते थे, लेकिन यह सख्ती बच्चों में धैर्य और मानसिक मजबूती विकसित करने का एक हिस्सा मानी जाती थी। पारिवारिक वातावरण भी ऐसा था कि माता-पिता शिक्षक के साथ खड़े रहते थे, जिससे घर और स्कूल दोनों की एक समान भूमिका दिखाई देती थी। स्कूल के बाद बच्चे मैदानों में खेलते थे, गिरते-पड़ते थे और स्वाभाविक तरीके से तनाव कम करते थे। इस प्रक्रिया में छात्र धीरे-धीरे मानसिक रूप से मजबूत होकर आगे की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार होते थे।
समय बदलने के साथ जब निजी स्कूलों और कोचिंग संस्थानों का दौर शुरू हुआ, तब शिक्षा एक व्यवस्थित व्यवसाय की तरह संचालित होने लगी। अत्यधिक फीस, ऊँची अपेक्षाएँ और प्रतिस्पर्धा के दबाव ने बच्चे को अध्ययन की एक सीमित परिधि में बांध दिया। कई अभिभावक बच्चों को डॉक्टर या इंजीनियर बनाने की इच्छा में उन पर लगातार दबाव बनाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब स्कूल से घर और घर से कोचिंग तक का दायरा ही बच्चों के जीवन का केंद्र बन जाए, तब खेल-कूद, रचनात्मकता और मानसिक स्वतंत्रता जैसी चीजें पीछे छूट जाती हैं।
शिक्षक द्वारा हल्की सख्ती को भी अब कई अभिभावक अनुचित मानते हुए स्कूलों में विवाद का रूप दे देते हैं। इसके कारण शिक्षक—छात्र संबंधों में दूरी बढ़ी है और बच्चों में अनुशासन तथा भावनात्मक सहनशीलता कमजोर हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार बढ़ती शैक्षणिक प्रतिस्पर्धा ने बच्चों को ‘सॉफ्ट टॉय’ की तरह संवेदनशील और दबावग्रस्त बना दिया है।
इसके विपरीत, समाज में अनेक ऐसे उदाहरण हैं जहां पारंपरिक करियर से इतर क्षेत्रों में काम कर रहे युवाओं ने अपने कौशल के आधार पर उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। जूते रिपेयर करने वाले एक युवा से लेकर शेफ, हलवाई, डेयरी उद्यमी, फर्नीचर निर्माता, ठेकेदार, दुकानदार, रेस्तरां संचालक और यहां तक कि आम सब्जी या चाय बेचने वाले व्यक्तियों तक—कई लोग बिना कोचिंग संस्कृति का हिस्सा बने अपनी योग्यता को हुनर में बदलकर महीने के लाखों रुपये कमा रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल डॉक्टर या इंजीनियर तैयार करना नहीं होना चाहिए, बल्कि बच्चों को उनकी रुचि और कौशल के अनुसार आगे बढ़ने की स्वतंत्रता देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। करियर के हजारों क्षेत्र मौजूद हैं, और हर क्षेत्र में सम्मानजनक तथा सफल जीवन की संभावनाएँ बराबर हैं। आवश्यकता इस बात की है कि अभिभावक बच्चों को किसी तय ढाँचे में ढालने के बजाय उनकी प्राकृतिक प्रवृत्तियों को समझते हुए मार्गदर्शन दें।
विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि बच्चों को अनुशासन, जिम्मेदारी और आत्मसंयम के साथ बड़ा होना चाहिए। अत्यधिक दबाव या पूर्ण स्वतंत्रता — दोनों ही स्थितियाँ बच्चों के भविष्य के लिए नुकसानदेह हो सकती हैं। अभिभावकों और शिक्षकों को एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है, ताकि बच्चे न तो तनावग्रस्त हों और न ही अनियंत्रित।
सामाजिक मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि शिक्षा को ‘नेचुरल’ रखना आज के दौर की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यदि बच्चों को उनकी क्षमता और रुचि के अनुसार दिशा दी जाए, तो वे न केवल तनावमुक्त जीवन जीते हैं, बल्कि अपने क्षेत्र में उत्कृष्टता भी प्राप्त करते हैं।
👉सुकबीर सिंह दवल
NGV PRAKASH NEWS

