SIR पर बहस के दौरान सुप्रीम सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी: “नागरिकता संवैधानिक आवश्यकता है”

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SIR प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस: चुनाव आयोग की शक्तियों पर सवाल, बेंच ने पूछा—क्या संदिग्ध नागरिकों की जांच भी न कर सके आयोग?

नई दिल्ली, 9 दिसंबर 2025
वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को हाई-वोल्टेज बहस देखने को मिली। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की दलील पर कि “चुनाव आयोग नागरिकता के मुद्दे पर फैसला नहीं कर सकता,” सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए पूछा—
“तो क्या संदिग्ध लोगों को भी मतदाता सूची में बने रहने दिया जाए?”

मामला विभिन्न राज्यों में वोटर लिस्ट के पुनरीक्षण के खिलाफ दाखिल याचिकाओं का है, जिनमें कहा गया है कि SIR प्रक्रिया नागरिकों पर असंवैधानिक रूप से सबूत का बोझ डालती है और निर्वाचन आयोग अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर निर्णय ले रहा है।


याचिकाकर्ताओं की दलील: नागरिकता तय करना आयोग का काम नहीं

सुप्रीम कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ के सामने सीनियर एडवोकेट शादान फरासत ने तर्क दिया कि—

  • संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत वयस्क मताधिकार के लिए तीन ही शर्तें हैं:
    भारतीय नागरिकता, 18 वर्ष की आयु और विशिष्ट अयोग्यता का अभाव।
  • जनप्रतिनिधित्व अधिनियम भी इन्हीं मानकों को दोहराता है और मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए कोई अतिरिक्त आधार नहीं देता।
  • यदि किसी मतदाता की नागरिकता संदिग्ध लगती है, तो केवल जिला मजिस्ट्रेट को इसकी जांच भेजी जा सकती है, न कि चुनाव आयोग।
  • विदेशी नागरिक घोषित करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार अथवा विदेशी न्यायाधिकरण के पास है।

याचिकाकर्ताओं का यह भी कहना था कि SIR प्रक्रिया प्रक्रियागत रूप से त्रुटिपूर्ण है और आम मतदाता को अपने ही देश की नागरिकता साबित करने के लिए मजबूर कर रही है।


सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी: “नागरिकता संवैधानिक आवश्यकता है”

जस्टिस बागची ने तल्ख़ अंदाज में पूछा—
“अगर आयोग नागरिकता की प्रारंभिक जांच भी न करे, तो क्या कोई भी संदिग्ध व्यक्ति 10–12 साल तक मतदाता सूची में बना रहेगा?”

बेंच ने यह भी कहा कि—

  • निर्वाचन आयोग किसी को गैर-नागरिक घोषित नहीं कर सकता, लेकिन
  • यदि किसी नामांकन पर गंभीर संदेह हो, तो जांच करना उसकी संवैधानिक ज़िम्मेदारी है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—
“निवास और आयु से नागरिकता स्वतः सिद्ध नहीं हो जाती। नागरिकता एक संवैधानिक अनिवार्यता है, केवल प्रक्रियागत औपचारिकता नहीं।”

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि—
क्या चुनाव आयोग को ऐसी जांच प्रक्रिया चलाने से भी रोका जा सकता है, जबकि उसे मतदाता सूची को विश्वसनीय और साफ रखने की जिम्मेदारी दी गई है?


मामले को लेकर अगली सुनवाई महत्वपूर्ण

कोर्ट ने सभी पक्षों से विस्तृत जवाब मांगा है। यह मुद्दा चुनाव प्रणाली, मतदाता पहचान और नागरिकता सत्यापन समेत कई संवैधानिक प्रश्नों को प्रभावित करता है। आने वाले दिनों में इस केस में होने वाली सुनवाई बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि इसका सीधा असर देशभर की मतदाता सूचियों पर पड़ सकता है।

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समाचार स्रोत- पीटीआई

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