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PSLV-C62 के साथ ISRO रचेगा 2026 का पहला अंतरिक्ष इतिहास, ‘अन्वेषा’ सैटेलाइट से बढ़ेगी भारत की रक्षा और पर्यावरण निगरानी क्षमता

नई दिल्ली, 11 जनवरी 2026 —
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इसरो 12 जनवरी 2026 की सुबह 10:17 बजे श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से PSLV-C62 रॉकेट लॉन्च करने जा रहा है। यह वर्ष 2026 की इसरो की पहली लॉन्चिंग होगी और पिछले वर्ष मई में हुई असफल उड़ान के बाद यह एक महत्वपूर्ण कमबैक मिशन माना जा रहा है। इस मिशन की लाइव स्ट्रीमिंग सुबह 9:48 बजे से इसरो के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर शुरू होगी। लॉन्च से पहले इसरो प्रमुख वी. नारायणन ने तिरुपति मंदिर में पूजा-अर्चना भी की।

PSLV-C62 मिशन का मुख्य पेलोड रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन द्वारा विकसित EOS-N1 सैटेलाइट है, जिसे ‘अन्वेषा’ नाम दिया गया है। यह एक अत्याधुनिक हाइपरस्पेक्ट्रल अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट है, जिसे ‘दिव्य दृष्टि’ भी कहा जा रहा है। यह सैटेलाइट सैकड़ों अलग-अलग स्पेक्ट्रल बैंड में धरती की तस्वीरें लेने में सक्षम है, जिससे सामान्य कैमरों से कहीं अधिक सूक्ष्म जानकारी मिल सकेगी।

इसरो के अनुसार अन्वेषा सैटेलाइट का उपयोग रक्षा, पर्यावरण, कृषि और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में किया जाएगा। हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग तकनीक से वनस्पति के नीचे छिपी वस्तुएं, जमीन में मौजूद बदलाव, जल प्रदूषण, फसल रोग और जंगलों में लगी आग जैसी घटनाओं की पहचान संभव होगी। रक्षा क्षेत्र में इससे सीमावर्ती इलाकों में होने वाली गतिविधियों पर अधिक सटीक नजर रखी जा सकेगी।

PSLV-C62 रॉकेट पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल की 64वीं उड़ान है और यह PSLV-DL वैरिएंट की पांचवीं उड़ान है। यह चार चरणों वाला रॉकेट है, जिसमें सॉलिड और लिक्विड दोनों प्रकार के ईंधन का उपयोग होता है। इसकी ऊंचाई लगभग 44.4 मीटर है और यह सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट में लगभग 1750 किलोग्राम तक का पेलोड ले जाने में सक्षम है। इसकी सफलता दर करीब 95 प्रतिशत रही है, जिसके कारण इसे इसरो का ‘वर्कहॉर्स’ कहा जाता है।

इस मिशन में अन्वेषा के अलावा 14 अन्य सह-यात्री सैटेलाइट्स भी भेजे जा रहे हैं, जिनमें भारत और विदेश के स्टार्टअप्स, विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों के सैटेलाइट्स शामिल हैं। इनमें असम डॉन बॉस्को यूनिवर्सिटी का ‘लाचित-1’ क्यूबसैट, नेपाल का अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट और कई स्टार्टअप्स के तकनीकी परीक्षण सैटेलाइट शामिल हैं। इन सैटेलाइट्स से संचार तकनीक, पर्यावरण निगरानी, शिक्षा और नवाचार को बढ़ावा मिलेगा।

इसरो का यह मिशन केवल एक लॉन्च नहीं बल्कि भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता, वैज्ञानिक क्षमता और वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में बढ़ती भूमिका का प्रतीक माना जा रहा है। रक्षा से लेकर खेती, पर्यावरण संरक्षण से लेकर आपदा प्रबंधन तक, इस मिशन से मिलने वाला डेटा आने वाले वर्षों में देश के लिए बेहद उपयोगी साबित होगा।

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