फर्जी एससी-एसटी एक्ट मामले में बेगुनाही कैसे साबित करें? FIR की आशंका होते ही तुरंत उठाएं ये कानूनी कदम…….

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फर्जी एससी-एसटी एक्ट मामले में बेगुनाही कैसे साबित करें? FIR की आशंका होते ही तुरंत उठाएं ये कानूनी कदम

नई दिल्ली, 17 फरवरी 2026.

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (एससी-एसटी) अत्याचार निवारण अधिनियम समाज के कमजोर वर्गों की सुरक्षा के लिए बनाया गया एक सख्त कानून है। हालांकि, कई मामलों में इसके कथित दुरुपयोग की शिकायतें भी सामने आती रही हैं, जिससे निर्दोष व्यक्तियों को कानूनी और सामाजिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति पर झूठा एससी-एसटी एक्ट का मुकदमा दर्ज हो जाए या FIR की आशंका हो, तो कुछ महत्वपूर्ण कानूनी कदम उठाकर अपनी बेगुनाही साबित की जा सकती है।

सबसे पहले, ऐसी स्थिति में मानसिक संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है। कानून केवल दोषियों को सजा देने के लिए ही नहीं, बल्कि निर्दोषों की रक्षा के लिए भी बनाया गया है। घबराने के बजाय तथ्यों और सबूतों पर ध्यान देना ही सबसे प्रभावी तरीका होता है।

विशेषज्ञ एडवोकेट की मदद लेना दूसरा महत्वपूर्ण कदम है। एससी-एसटी एक्ट के मामलों में अनुभवी वकील FIR की धाराओं का विश्लेषण कर उचित कानूनी रणनीति तैयार करता है और गिरफ्तारी से बचाव के विकल्पों पर मार्गदर्शन देता है।

एससी-एसटी एक्ट में अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) सामान्य मामलों की तरह सीधे उपलब्ध नहीं होती, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार, यदि प्रथम दृष्टया मामला संदिग्ध या कमजोर हो, तो सेशन कोर्ट या हाई कोर्ट से राहत के लिए याचिका दायर की जा सकती है।

सबूत एकत्र करना इस तरह के मामलों में निर्णायक भूमिका निभाता है। घटना के समय की लोकेशन, सीसीटीवी फुटेज, कॉल रिकॉर्डिंग, व्हाट्सएप चैट और अन्य डिजिटल या भौतिक प्रमाण अदालत में निर्दोष साबित करने में मददगार साबित होते हैं।

यदि मामला पूरी तरह से फर्जी प्रतीत होता है, तो आरोपी हाई कोर्ट में बीएनएसएस की धारा 528 (पूर्व में सीआरपीसी धारा 482) के तहत FIR रद्द करने की याचिका दाखिल कर सकता है। हाई कोर्ट उपलब्ध तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर FIR को निरस्त करने का आदेश दे सकता है।

पुलिस जांच के दौरान जांच अधिकारी के साथ सहयोग करना भी आवश्यक होता है। आरोपी को अपने पक्ष के गवाहों और सबूतों की जानकारी पुलिस को देनी चाहिए, जिससे जांच निष्पक्ष रूप से आगे बढ़ सके।

ट्रायल के दौरान क्रॉस-एग्जामिनेशन एक अहम प्रक्रिया होती है, जिसमें बचाव पक्ष का वकील शिकायतकर्ता के बयान में विरोधाभास उजागर कर सकता है। झूठे मामलों में अक्सर साक्ष्य और बयान अदालत में टिक नहीं पाते और सच्चाई सामने आ जाती है।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यदि आरोपी अदालत से बरी हो जाता है, तो वह शिकायतकर्ता के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दर्ज कर सकता है और मानसिक प्रताड़ना के लिए मुआवजे की मांग भी कर सकता है। यह कानूनी अधिकार निर्दोष व्यक्ति की प्रतिष्ठा और अधिकारों की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

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