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सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का विवादित फैसला किया रद्द, नाबालिग से दुष्कर्म के प्रयास का मामला बहाल
नई दिल्ली, 18 फरवरी 2026.
सुप्रीम कोर्ट ने 11 वर्ष की नाबालिग बच्ची से जुड़े यौन अपराध के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के विवादित फैसले को निरस्त करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि आरोपियों के खिलाफ दुष्कर्म के प्रयास का मुकदमा चलेगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पीड़िता को जबरन सुनसान स्थान पर ले जाकर उसके साथ की गई हरकतों को केवल गरिमा पर आघात नहीं माना जा सकता, बल्कि यह दुष्कर्म के प्रयास की श्रेणी में आता है।
📍यह मामला उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने 17 मार्च 2025 को दिए आदेश में कहा था कि पीड़िता को खींचकर पुलिया के नीचे ले जाना, उसके शरीर के संवेदनशील अंगों को पकड़ना और पजामे की डोरी तोड़ना दुष्कर्म का प्रयास नहीं माना जा सकता। हाई कोर्ट ने इस आधार पर आरोपियों पर लगी भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (बलात्कार) और धारा 511 (प्रयास) तथा पॉक्सो एक्ट की संबंधित धाराओं को हटाते हुए केवल धारा 354-B और पॉक्सो एक्ट की धारा 9 के तहत मुकदमा चलाने का निर्देश दिया था।
💥हाई कोर्ट के इस फैसले पर देशभर में आपत्ति जताई गई थी, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए मामले की सुनवाई शुरू की। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पहले हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाई और अब अंतिम निर्णय में उसे पूरी तरह रद्द कर दिया है।
तीन जजों की पीठ की ओर से दिए गए फैसले में कहा गया कि किसी अपराध की तैयारी और अपराध का प्रयास दो अलग-अलग स्थितियां होती हैं। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में नाबालिग को जबरन बाइक पर बैठाकर सुनसान स्थान पर ले जाना, उसे पुलिया के नीचे खींचना और उसके साथ यौन दुर्व्यवहार करना स्पष्ट रूप से दुष्कर्म के प्रयास की श्रेणी में आता है। ऐसे में आरोपियों के खिलाफ गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा चलना आवश्यक है।
➡️सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में न्यायिक संवेदनशीलता पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यौन अपराधों के मामलों में न्यायिक अधिकारियों को अधिक संवेदनशील और पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। इसी उद्देश्य से कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी, भोपाल के निदेशक जस्टिस अनिरुद्ध बोस की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया है। यह समिति यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए न्यायिक दिशा-निर्देश तैयार करेगी और न्यायिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी और संवेदनशील बनाने के उपाय सुझाएगी।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब आरोपियों पर दुष्कर्म के प्रयास सहित गंभीर धाराओं में मुकदमा चलेगा। इस निर्णय को यौन अपराधों के मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण को स्पष्ट करने और पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
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