इलाज बना आर्थिक बोझ: महंगे अस्पताल और व्यवस्था के बीच पिसता आम आदमी…….

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इलाज बना आर्थिक बोझ: महंगे अस्पताल, बीमा और व्यवस्था के बीच पिसता आम आदमी

⏩आज के समय में इलाज कराना आम आदमी के लिए सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती बनता जा रहा है। एक तरफ बीमारियां बढ़ रही हैं, तो दूसरी तरफ इलाज का खर्च इस कदर बढ़ चुका है कि मध्यम वर्ग और गरीब परिवार के लिए अस्पताल का दरवाजा खटखटाना भी एक बड़ी मुसीबत बन गया है।

प्राइवेट अस्पतालों में भर्ती होने के बाद जो बिल सामने आता है, वह कई परिवारों की सालों की बचत को खत्म कर लम्बे कर्ज के बोझ का दर्द देता है। मामूली ऑपरेशन या कुछ दिनों की भर्ती में ही लाखों रुपये का खर्च सामने आ जाता है, जिससे आम आदमी कर्ज लेने या संपत्ति बेचने तक के लिए मजबूर हो जाता है।

💥सरकार ने गरीबों को राहत देने के लिए आयुष्मान भारत योजना शुरू की, जिसका उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को मुफ्त इलाज की सुविधा देना था। लेकिन जमीनी स्तर पर देखा जाए तो इस योजना का लाभ हर जरूरतमंद तक नहीं पहुंच पा रहा है।

👉 जिन परिवारों में छह से कम सदस्य हैं या जिनकी आय थोड़ी बहुत नियमित दिखती है, वे इस योजना की पात्रता से बाहर हो जाते हैं, भले ही उनकी वास्तविक आर्थिक स्थिति कितनी भी खराब क्यों ना हो और उनकी आर्थिक स्तिथि इलाज कराने की अनुमति नहीं देती हो। ऐसे में बड़ी संख्या में निम्न मध्यम वर्ग और सीमित आय वाले परिवार इस योजना के लाभ से वंचित रह जाते हैं।

📍दूसरी ओर, सरकारी कर्मचारियों को न केवल नियमित और अच्छी सैलरी मिलती है, बल्कि उन्हें और उनके परिवार को सरकारी खर्च पर इलाज की सुविधा भी उपलब्ध होती है। इससे समाज में एक असमानता का भाव पैदा होता है, जहां एक वर्ग को इलाज की पूरी सुरक्षा प्राप्त है, जबकि आम आदमी को इलाज के लिए अपनी जेब से भारी खर्च उठाना पड़ता है। इस असंतुलन का असर समाज के आर्थिक और मानसिक संतुलन पर भी पड़ता है।

➡️प्राइवेट अस्पतालों की कार्यप्रणाली भी आम आदमी के लिए कई बार चिंता का कारण बनती है। जिन मरीजों के पास आयुष्मान कार्ड होता है, उनके इलाज में कई बार अस्पताल योजना के तहत मिलने वाली पूरी राशि का उपयोग एक ही बीमारी में कर लेते हैं, जिससे मरीज भविष्य में किसी अन्य गंभीर बीमारी के समय योजना का लाभ नहीं उठा पाता। इससे योजना का उद्देश्य सीमित हो जाता है और मरीज फिर से आर्थिक संकट में फंस जाता है।

📍इसके अलावा, स्वास्थ्य बीमा कंपनियों का प्रीमियम भी लगातार बढ़ता जा रहा है। महंगाई के इस दौर में जहां आम आदमी के लिए रोजमर्रा का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा है, वहीं हर महीने या वार्षिक भारी बीमा प्रीमियम भरना एक टेड़ी खीर साबित होता है। आम आदमी के सामने यह दुविधा रहती है कि वह परिवार की मूलभूत जरूरतें पूरी करे या भविष्य की बीमारी से बचाव के लिए बीमा की किश्त भरे।

💥स्वास्थ्य सेवाओं की यह स्थिति एक बड़े सामाजिक और आर्थिक सवाल को जन्म देती है। इलाज हर व्यक्ति की बुनियादी जरूरत है, लेकिन जब यह जरूरत आर्थिक बोझ में बदल जाती है, तो यह केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं रह जाती, बल्कि यह पूरे समाज और व्यवस्था के लिए चिंता का विषय बन जाती है। ऐसे समय में जरूरत है कि स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ, पारदर्शी और आम आदमी की पहुंच के भीतर बनाया जाए, ताकि किसी भी व्यक्ति को केवल आर्थिक कारणों से इलाज से वंचित न रहना पड़े।

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