Gyan Prakash Dubey ➡️ NGV PRAKASH NEWS

जाति, धर्म और मूल निवासी की राजनीति: समाज को बांटने की खतरनाक परंपरा और संविधान के मूल्यों पर खतरा
💥भारत हजारों वर्षों की सभ्यता, विविधता और सह-अस्तित्व की परंपरा वाला देश है। यहां अनेक धर्म, जातियां, भाषाएं और संस्कृतियां साथ-साथ विकसित हुईं और यही विविधता भारत की सबसे बड़ी ताकत बनी। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण रूप से, समय-समय पर इस विविधता को ताकत बनाने के बजाय राजनीतिक और सामाजिक स्वार्थों के लिए इसे विभाजन का आधार बनाया गया। पहले समाज को धर्म के नाम पर बांटा गया, फिर जाति के आधार पर विभाजित किया गया और अब एक बार फिर “जाति” और “मूल निवासी” जैसे शब्दों को हथियार बनाकर समाज में जहर घोलने की कोशिश की जा रही है। यह प्रवृत्ति न केवल सामाजिक समरसता के लिए खतरा है, बल्कि संविधान के मूल भाव—समता, बंधुत्व और न्याय—के भी विपरीत है।
📍धर्म के नाम पर विभाजन: इतिहास का कड़वा अध्याय
भारत का इतिहास इस बात का गवाह है कि धर्म के नाम पर समाज को बांटने की राजनीति ने कितना बड़ा नुकसान पहुंचाया है। आजादी से पहले अंग्रेजों ने “फूट डालो और राज करो” की नीति अपनाई, जिसके तहत हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच अविश्वास और दूरी पैदा की गई। इसका परिणाम 1947 में देश के विभाजन के रूप में सामने आया, जिसमें लाखों लोग विस्थापित हुए और लाखों की जान गई। यह विभाजन केवल भूगोल का नहीं था, बल्कि समाज के दिलों में भी गहरी दरार छोड़ गया।
आजादी के बाद संविधान निर्माताओं ने इस दर्दनाक अनुभव से सीख लेते हुए एक ऐसे भारत की कल्पना की, जहां धर्म के आधार पर कोई भेदभाव न हो। संविधान की प्रस्तावना में स्पष्ट रूप से “समानता”, “न्याय” और “बंधुत्व” को राष्ट्र की आधारशिला बनाया गया। लेकिन समय के साथ धर्म आधारित राजनीति ने फिर से समाज में संदेह और टकराव के बीज बोने शुरू कर दिए।
⏩जाति के नाम पर राजनीति: सामाजिक संरचना से राजनीतिक हथियार तक
धर्म के बाद समाज को सबसे ज्यादा विभाजित करने वाला तत्व जाति बनी। भारत में जाति व्यवस्था ऐतिहासिक रूप से एक सामाजिक ढांचा थी, लेकिन आधुनिक राजनीति ने इसे वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। जाति पहचान को सामाजिक उत्थान के बजाय राजनीतिक लाभ के लिए प्रयोग किया गया।
चुनावों में जातिगत समीकरणों के आधार पर उम्मीदवारों का चयन, जाति आधारित रैलियां, और जातीय भावनाओं को भड़काने वाले बयान आम हो गए। इससे समाज में आपसी विश्वास कमजोर हुआ और लोगों की पहचान एक नागरिक के बजाय एक जाति विशेष के सदस्य के रूप में होने लगी। यह प्रवृत्ति संविधान के उस मूल सिद्धांत के विपरीत है, जिसमें हर नागरिक को समान अधिकार और सम्मान देने की बात कही गई है।
👉“मूल निवासी” बनाम “अन्य”: एक नया सामाजिक टकराव
हाल के वर्षों में “मूल निवासी” और “अन्य” जैसे शब्दों को लेकर एक नई बहस शुरू हुई है। इस बहस को इस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है, मानो समाज में कुछ लोग असली अधिकार के हकदार हैं और कुछ नहीं। यह विचार न केवल ऐतिहासिक रूप से जटिल और विवादित है, बल्कि सामाजिक समरसता के लिए भी खतरनाक है।
भारत का संविधान किसी को “मूल निवासी” या “बाहरी” के आधार पर अधिकार नहीं देता। संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है, चाहे उनका धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्र कुछ भी हो। लेकिन जब राजनीतिक या सामाजिक स्वार्थ के लिए “मूल निवासी” बनाम “अन्य” का नैरेटिव गढ़ा जाता है, तो यह समाज में अविश्वास और टकराव को जन्म देता है।
📍संविधान की भावना और सामाजिक समरसता का महत्व
भारत का संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक अनुबंध है, जो सभी नागरिकों को समान अधिकार और अवसर देने की गारंटी देता है। संविधान की प्रस्तावना में “हम भारत के लोग” शब्दों का प्रयोग यह स्पष्ट करता है कि देश की पहचान जाति, धर्म या क्षेत्र से नहीं, बल्कि नागरिकता से है।
डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान बनाते समय स्पष्ट कहा था कि “राजनीतिक समानता तभी सार्थक होगी, जब सामाजिक और आर्थिक समानता भी सुनिश्चित हो। लेकिन जब समाज को बार-बार जाति और पहचान के आधार पर बांटा जाता है, तो यह संविधान के उस लक्ष्य को कमजोर करता है।”
➡️जातिगत और पहचान आधारित टकराव का देश के विकास पर प्रभाव
जब समाज जाति और पहचान के आधार पर विभाजित होता है, तो इसका सीधा असर देश के विकास पर पड़ता है। समाज का ध्यान शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं से हटकर पहचान आधारित विवादों में उलझ जाता है। इससे न केवल सामाजिक तनाव बढ़ता है, बल्कि राष्ट्रीय एकता भी कमजोर होती है।
इतिहास इस बात का प्रमाण है कि जो समाज आंतरिक रूप से विभाजित होता है, वह विकास की दौड़ में पीछे रह जाता है। इसके विपरीत, जो समाज एकजुट होकर काम करता है, वह तेजी से प्रगति करता है।
राजनीतिक स्वार्थ बनाम राष्ट्रीय हित
यह एक कटु सत्य है कि कई बार राजनीतिक स्वार्थों के लिए समाज को जाति और पहचान के आधार पर बांटने की कोशिश की जाती है। चुनावों के समय जातिगत और धार्मिक पहचान को प्रमुखता देकर लोगों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा किया जाता है। यह अल्पकालिक राजनीतिक लाभ तो दे सकता है, लेकिन दीर्घकाल में समाज और देश दोनों के लिए नुकसानदेह है।
जबकि राजनीति का उद्देश्य समाज को जोड़ना और विकास की दिशा में आगे बढ़ाना होना चाहिए, न कि लोगों के बीच विभाजन पैदा करना।
👉👉समाधान: संविधान के मूल्यों की ओर वापसी
इस स्थिति से बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता संविधान के मूल्यों—समता, बंधुत्व और न्याय—की ओर लौटना है। समाज को यह समझना होगा कि हमारी सबसे बड़ी पहचान हमारी नागरिकता है, न कि हमारी जाति या धर्म।
शिक्षा, जागरूकता और सामाजिक संवाद के माध्यम से ही इस विभाजनकारी प्रवृत्ति को रोका जा सकता है। मीडिया, शिक्षण संस्थानों और सामाजिक संगठनों की भी जिम्मेदारी है कि वे समाज में एकता और भाईचारे का संदेश फैलाएं।
🎤अंत में- एकजुट समाज ही मजबूत राष्ट्र की नींव
भारत की ताकत उसकी विविधता में एकता है। लेकिन जब इस विविधता को विभाजन का आधार बनाया जाता है, तो यह देश की एकता और विकास दोनों के लिए खतरा बन जाता है। धर्म, जाति या मूल निवासी के नाम पर समाज को बांटना न तो संविधान के अनुरूप है और न ही देश के भविष्य के लिए सही है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम संविधान की भावना को समझें और एक ऐसे समाज के निर्माण में योगदान दें, जहां हर व्यक्ति को समान सम्मान और अवसर मिले। क्योंकि एकजुट समाज ही एक मजबूत और विकसित राष्ट्र की नींव होता है।
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